हिंदू धर्म में भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की आराधना का विशेष महत्व है। वैसे तो साल में एक बार आने वाली ‘थिरुकार्तिगाई’ बहुत बड़े स्तर पर मनाई जाती है, लेकिन प्रत्येक माह आने वाली मासिक कार्तिगाई का भी अपना एक विशेष आध्यात्मिक फल है।
यदि आप अपने जीवन में साहस, विजय और बाधाओं से मुक्ति चाहते हैं, तो मासिक कार्तिगाई के दिन भगवान मुरुगन की पूजा करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है। आइए जानते हैं, घर पर सरल और संपूर्ण विधि से अभिषेक और दीप दान कैसे करें।
मासिक कार्तिगाई का महत्व
शास्त्रों के अनुसार, भगवान मुरुगन का जन्म ‘कृत्तिका नक्षत्र’ में हुआ था, इसलिए इस दिन को उनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। दक्षिण भारत में इसे मुख्य रूप से मनाया जाता है, लेकिन अब उत्तर भारत और अन्य हिस्सों में भी भक्त इस दिन व्रत और पूजन करते हैं। मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से कुंडली के मंगल दोष का प्रभाव कम होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
मासिक कार्तिगाई पूजा की तैयारी (सामग्री)
पूजा शुरू करने से पहले निम्नलिखित सामग्री एकत्रित कर लें:
- भगवान मुरुगन की मूर्ति या चित्र (षन्मुख या कार्तिकेय)।
- अभिषेक के लिए कच्चा दूध, शहद, दही, गन्ने का रस, पंचामृत और शुद्ध जल।
- दीप दान के लिए मिट्टी के दीये, घी या तिल का तेल और रूई की बत्ती।
- अन्य – लाल चंदन, कुमकुम, ताजे फूल (विशेषकर लाल फूल), फल और नैवेद्य (पंचामृत या पोंगल)।
भगवान मुरुगन का अभिषेक चरण-दर-चरण विधि
अभिषेक भगवान को प्रसन्न करने की एक प्रेममयी प्रक्रिया है। इसे श्रद्धापूर्वक इस प्रकार करें:
- सबसे पहले स्वयं शुद्ध होकर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक तांबे या पीतल की थाली में भगवान मुरुगन की प्रतिमा रखें।
- ‘ॐ शरवण भवाय नमः’ का जाप करते हुए प्रतिमा पर शुद्ध जल अर्पित करें।
- इसके बाद दूध, दही, शहद और घी से बारी-बारी अभिषेक करें। भगवान मुरुगन को विभूति (भस्म) का अभिषेक अत्यंत प्रिय है, यदि संभव हो तो अंत में विभूति चढ़ाएं।
- अभिषेक के बाद प्रतिमा को साफ वस्त्र से पोंछें। अब उन्हें लाल चंदन और कुमकुम का तिलक लगाएं। उन्हें पुष्प माला अर्पित करें।
मासिक कार्तिगाई – दीप दान
मासिक कार्तिगाई में ‘दीप दान’ का सबसे अधिक महत्व है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
- इस दिन कम से कम 6 दीये जलाने का विधान है (मुरुगन के 6 मुखों का प्रतीक)। आप अपनी सामर्थ्य अनुसार अधिक भी जला सकते हैं।
- मुख्य दीप भगवान की मूर्ति के सामने रखें और अन्य दीये घर के मुख्य द्वार, तुलसी के पौधे के पास और छत पर रखें।
- दीया जलाते समय मन में अपनी मनोकामना का स्मरण करें और ‘कार्तिकेय अष्टकम’ या उनके मूल मंत्र का जाप करें।
भोग और आरती
पूजा के अंत में भगवान को मौसमी फल और मीठा प्रसाद (जैसे गुड़ वाले चावल या लड्डू) अर्पित करें। कपूर जलाकर उनकी आरती करें और ज्ञात-अज्ञात गलतियों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
विशेष मंत्र – “ॐ त्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि तन्नो स्कन्दः प्रचोदयात्॥”
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