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माँ कुब्जिका जयन्ती कथा

Maa Kubjika Jayanti Katha Hindi

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कुब्जिका जयन्ती (Kubjika Jayanti) मुख्य रूप से शाक्त परंपरा और कौलमार्ग के अनुयायियों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। माँ कुब्जिका को ‘वक्रेश्वरी’ या ‘कुलकुण्डलिनी’ का स्वरूप माना जाता है। यहाँ माँ कुब्जिका के प्राकट्य की पौराणिक कथा विस्तार से दी गई है:

|| माँ कुब्जिका जयन्ती कथा ||

पौराणिक मान्यताओं और आगम शास्त्रों के अनुसार, माँ कुब्जिका का अवतार शिव और शक्ति के मिलन और सृष्टि के गुप्त रहस्यों को प्रकट करने के लिए हुआ था।

कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव (आदिनाथ) और माता पार्वती हिमालय के एकांत शिखर पर विराजमान थे। देवी ने महादेव से सृष्टि के उस गुप्त मार्ग के बारे में पूछा जिससे साधक संसार के बंधनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त कर सके। महादेव ने तब ‘पश्चिम आम्नाय’ (Westward Tradition) के रहस्यमय ज्ञान की चर्चा की।

जब महादेव ने इस परम विद्या का आह्वान किया, तब शक्ति ने एक अत्यंत विलक्षण रूप धारण किया। वे एक ‘कुब्जा’ (कुबड़ी) वृद्ध स्त्री के रूप में प्रकट हुईं। उनके इस स्वरूप को देखकर स्वयं महादेव भी विस्मित रह गए।

माँ के इस झुके हुए (कुब्ज) रूप का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। यह ‘कुण्डलिनी शक्ति’ का प्रतीक है, जो आधार चक्र (मूलाधार) में साढ़े तीन फेरे लेकर सुप्त अवस्था में ‘कुब्ज’ (मुड़ी हुई) रहती है। जैसे ही माँ कुब्जिका जागृत होती हैं, साधक का मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

कथा में यह भी उल्लेख मिलता है कि जब अंधकासुर और अन्य राक्षसों का अत्याचार बढ़ा, तब माँ कुब्जिका ने अपनी योग माया से उन्हें परास्त किया। उन्होंने अपनी दिव्य शक्तियों से ब्रह्मांड के असंतुलन को ठीक किया और देवताओं को अभयदान दिया।

माँ कुब्जिका ने ही सर्वप्रथम भगवान शिव को ‘नवार्ण मंत्र’ और ‘शाम्भव उपाय’ की दीक्षा दी थी। इस प्रकार, इस मार्ग में शक्ति को ‘गुरु’ के रूप में भी पूजा जाता है। उनकी आराधना से साधक को न केवल भोग (सांसारिक सुख) बल्कि अपवर्ग (मोक्ष) की भी प्राप्ति होती है।

|| कुब्जिका जयन्ती का महत्व ||

  • कुण्डलिनी जागरण – यह दिन साधकों के लिए अपनी आंतरिक शक्ति को जाग्रत करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
  • तांत्रिक सिद्धि – माँ कुब्जिका को ‘समस्त विद्याओं की स्वामिनी’ कहा जाता है। तांत्रिक और अघोर पंथ में इनकी साधना गुप्त रूप से की जाती है।
  • पाप मुक्ति – श्रद्धापूर्वक इस कथा के श्रवण और माँ के पूजन से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय होता है।

विशेष – माँ कुब्जिका के पूजन में ‘श्रीचक्र’ और ‘ह्रीं’ बीज मंत्र का विशेष महत्व है। उनकी स्तुति में कहा गया है कि वे टेढ़ी चाल चलने वाली (सर्पिणी के समान) और अनंत ब्रह्मांडों को धारण करने वाली हैं।

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