भगवान झूलेलाल को वरुण देव (जल के देवता) का अवतार माना जाता है। सिंधी समाज उन्हें अपने इष्ट देव के रूप में पूजता है और उनकी जयंती को ‘चेटी चंड’ के रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाता है। यहाँ भगवान झूलेलाल के अवतरण की विस्तृत कथा दी गई है:
|| भगवान झूलेलाल अवतार कथा ||
कथा मध्यकालीन भारत के सिंध प्रदेश (वर्तमान पाकिस्तान) की है। उस समय सिंध पर मिरखशाह नाम के एक क्रूर राजा का शासन था। वह एक कट्टरपंथी शासक था जो अपनी प्रजा पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाल रहा था। उसने हिंदुओं को आदेश दिया कि या तो वे इस्लाम स्वीकार करें या मृत्यु के लिए तैयार रहें।
मिरखशाह के अत्याचारों से त्रस्त होकर सिंधी समाज ने अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए भगवान की शरण में जाने का निर्णय लिया।
समस्त सिंधी समाज सिंधु नदी के किनारे एकत्रित हुआ। उन्होंने भूखे-प्यासे रहकर चालीस दिनों तक जल के देवता वरुण देव की कठोर तपस्या की। इस साधना को ‘चालीहो साहब’ कहा जाता है। उन्होंने प्रार्थना की, “हे जल के स्वामी! हमारी रक्षा करें, हमें इस अत्याचारी राजा के चंगुल से बचाएं।”
भक्तों की करुण पुकार सुनकर चालीसवें दिन आकाशवाणी हुई – “घबराओ मत! मैं नसिरपुर के एक साधारण परिवार में माता देवकी और पिता रतनराय के घर बालक के रूप में जन्म लूँगा और मिरखशाह के अभिमान को नष्ट करूँगा।”
विक्रम संवत 1007 (950 ईस्वी) में चैत्र शुक्ल द्वितीया के दिन नसिरपुर में बालक का जन्म हुआ। इस बालक का नाम ‘उदयरचंद’ रखा गया। जन्म के समय बालक के मुख में सिंधु नदी के दर्शन हुए और पूरा कमरा अलौकिक प्रकाश से भर गया। लोग उन्हें प्रेम से ‘झूलेलाल’ कहने लगे क्योंकि उनका पालना (झूला) अपने आप झूलता रहता था।
जब मिरखशाह को इस दैवीय बालक के बारे में पता चला, तो उसने उन्हें मारने के लिए कई सेनापति भेजे, लेकिन वे सब असफल रहे। अंततः मिरखशाह ने स्वयं अपनी सेना के साथ हमला किया।
भगवान झूलेलाल ने अपने चमत्कार दिखाए। अचानक चारों ओर जल का सैलाब आ गया और मिरखशाह के महल में आग लग गई। राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने देखा कि बालक एक योद्धा के रूप में घोड़े पर सवार है और उसके चारों ओर तेज प्रकाश है। मिरखशाह भगवान झूलेलाल के चरणों में गिर गया और क्षमा मांगी।
भगवान झूलेलाल ने मिरखशाह को उपदेश दिया कि “ईश्वर एक है, उसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। हिंदू और मुसलमान उसी की संतान हैं।” उन्होंने धर्म की रक्षा की और प्रजा को भयमुक्त किया। जब उनका कार्य पूर्ण हुआ, तो वे अपने घोड़े सहित सिंधु नदी में समाहित हो गए।
|| झूलेलाल जयंती (चेटी चंड) का महत्व ||
- बहराणा साहब – इस दिन सिंधी समाज एक सुंदर लकड़ी के मंदिर (बहराणा साहब) को सजाता है, जिसमें जोत (दीपक), फल, इलायची और ‘अखा’ (चावल और चीनी) रखा जाता है।
- पल्लव – सुख-समृद्धि के लिए सामूहिक प्रार्थना की जाती है जिसे ‘पल्लव’ कहते हैं।
- छेज – ढोल की थाप पर पारंपरिक लोक नृत्य किया जाता है।
|| भगवान झूलेलाल के विभिन्न नाम ||
- लाल साईं – भक्तों के प्रिय
- उदयरचंद – उदय होने वाला चंद्रमा
- वरुण देव – जल के देवता का स्वरूप
- जिंदा पीर – मुस्लिम समुदायों द्वारा दी गई श्रद्धा
- अमरलाल – जो सदैव अमर हैं
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