गणाधिप संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित एक अत्यंत शुभ व्रत है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास (कहीं-कहीं कार्तिक) के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 27 नवंबर, शुक्रवार को रखा जाएगा।
सनातन धर्म में भगवान गणेश (Lord Ganesha) को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य से पहले उनकी वंदना और पूजा-अर्चना करने से सभी विघ्न (Obstacles) दूर होते हैं। इन्हीं विघ्नहर्ता को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है ‘संकष्टी चतुर्थी’ (Sankashti Chaturthi)। साल भर में आने वाली 12 संकष्टी चतुर्थियों में से, गणाधिप संकष्टी चतुर्थी का विशेष स्थान है। आइए, इस विशेष संकष्टी के महत्व, व्रत विधि और पौराणिक कथा को विस्तार से जानते हैं।
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी 2026 – शुभ मुहूर्त
- गणाधिप संकष्टी चतुर्थी 2026 – 27 नवंबर, शुक्रवार
- चतुर्थी तिथि प्रारंभ – नवम्बर 27, 2026 को 09:48 AM बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्त – नवम्बर 28, 2026 को 06:39 AM बजे
- चंद्रोदय का समय – 27 नवंबर 2026, रात 08:12 बजे
क्यों है यह संकष्टी विशेष? (Why is it special?)
प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के विशेष स्वरूप की पूजा की जाती है। मार्गशीर्ष मास की संकष्टी को ‘गणाधिप संकष्टी चतुर्थी’ कहते हैं और इस दिन उनके ‘गणाधिप’ स्वरूप की उपासना की जाती है।
- गणों के अधिपति – ‘गणाधिप’ का अर्थ होता है ‘गणों के अधिपति’ या ‘समूहों के स्वामी’। यह स्वरूप विशेष रूप से साधक को नेतृत्व क्षमता (Leadership Qualities) प्रदान करता है और उन्हें अपने कर्मक्षेत्र (Career) और सामाजिक जीवन में सफलता दिलाता है।
- मार्गशीर्ष का महत्व – मार्गशीर्ष मास को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। इस मास में किए गए व्रत-उपवास और दान-पुण्य का फल (Rewards) कई गुना अधिक मिलता है।
- संकटों से मुक्ति – संकष्टी का मूल अर्थ ही है— ‘संकटों से मुक्ति’। जो भक्त इस दिन सच्चे मन से गणाधिप गणेश की आराधना करते हैं, उनके जीवन के सभी विघ्न, आर्थिक समस्याएं और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां दूर होती हैं।
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी 2026 व्रत विधि (Vrat Vidhi)
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी का व्रत अत्यंत सावधानी और श्रद्धापूर्वक करना चाहिए।
- व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त (Early Morning) में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को साफ कर गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प (Pledge) लें।
- गणेश जी को पीले वस्त्र, रोली, अक्षत, धूप, दीप, गंध, सिन्दूर अर्पित करें।
- भगवान गणेश को दूर्वा घास (Durva Grass) और मोदक (Modak) या लड्डू का भोग लगाना अनिवार्य है। तुलसी का प्रयोग वर्जित है।
- पूरे दिन निराहार (Fasting) या फलाहार (Fruits only) व्रत रखें। दिन में गणाधिप संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा सुनें या पढ़ें। ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करें।
- रात्रि में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य (Offering of water) दें। अर्घ्य में जल, दूध, चंदन और अक्षत मिलाएँ।
- चंद्र दर्शन और अर्घ्य के बाद गणेश जी को लगाए गए प्रसाद से अपना व्रत खोलें और फिर सात्विक भोजन ग्रहण करें।
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक कथा (Pauranic Katha)
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी के संबंध में कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से हनुमान जी से जुड़ी कथा विशेष रूप से प्रभावशाली है:
हनुमान जी और समुद्र लांघने का प्रसंग
पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेतायुग में जब भगवान राम पत्नी सीता की खोज कर रहे थे, तब लंका पहुंचने के लिए विशाल समुद्र को पार करने की चुनौती (Challenge) सामने आई। सभी वानर सेना निराश थी।
तभी, गिद्धराज संपाती ने हनुमान जी को देखकर कहा कि आपमें अपार शक्ति है, लेकिन आप अपनी शक्तियों को भूल गए हैं। उन्होंने हनुमान जी को गणाधिप संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने की सलाह दी।
संपाती के वचनों को सुनकर, हनुमान जी ने श्रद्धापूर्वक गणाधिप संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया और विधि-विधान से गणेश जी की पूजा की। इस व्रत के प्रभाव से उनकी शक्तियाँ जागृत हुईं और वे क्षणभर में ही विशाल समुद्र को लांघकर लंका पहुँच गए।
गणाधिप संकष्टी 2026 का महत्व (Importance)
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- विघ्न निवारण – यह व्रत जीवन के सभी संकटों, समस्याओं और बाधाओं को दूर करता है, जिससे जीवन में शांति और स्थिरता (Stability) आती है।
- बुद्धि और ज्ञान – भगवान गणेश को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है। यह व्रत करने से बुद्धि का विकास होता है और सही निर्णय लेने की क्षमता (Decision-making ability) बढ़ती है।
- सुख-समृद्धि – गणाधिप गणेश की कृपा से घर में सुख-समृद्धि, धन-संपदा और सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का वास होता है।
- अखंड सौभाग्य – विवाहित महिलाएँ यह व्रत पति की लंबी आयु और संतान के कल्याण (Well-being) के लिए करती हैं, जिससे उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
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