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कृष्ण वामन द्वादशी कथा

Krishan Vaman Dwadashi Katha Hindi

Shri VishnuVrat Katha (व्रत कथा संग्रह)हिन्दी
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कृष्ण वामन द्वादशी (जिसे वामन जयंती भी कहा जाता है) की कथा भगवान विष्णु के पांचवें अवतार, भगवान वामन को समर्पित है। यह कथा अहंकार के विनाश और संपूर्ण समर्पण की शक्ति को दर्शाती है। यहाँ वामन द्वादशी की पौराणिक कथा विस्तार से दी गई है:

|| श्री वामन अवतार कथा ||

प्राचीन काल में दैत्यराज बलि (प्रह्लाद के पौत्र) ने अपनी शक्ति और तपस्या से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। बलि एक अत्यंत दानी और न्यायप्रिय राजा था, लेकिन दैत्य गुरु शुक्राचार्य की प्रेरणा से उसने स्वर्ग पर भी कब्जा कर लिया। इससे इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर स्वर्ग से निष्कासित हो गए।

देवताओं की दुर्दशा देखकर उनकी माता अदिति अत्यंत दुखी हुईं। उन्होंने अपने पुत्रों के उद्धार के लिए भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की (पयोव्रत अनुष्ठान)। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने प्रकट होकर उन्हें वरदान दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेकर देवताओं को उनका राज्य वापस दिलाएंगे।

भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को माता अदिति के गर्भ से भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) के रूप में अवतार लिया। उनके एक हाथ में कमंडल, दूसरे में दंड (लाठी), सिर पर शिखा और पैरों में खड़ाऊं थी।

उधर, राजा बलि नर्मदा नदी के तट पर ‘अश्वमेध यज्ञ’ कर रहे थे। भगवान वामन वहां पहुंचे। राजा बलि ने उनका स्वागत किया और उनसे अपनी इच्छा अनुसार दान मांगने को कहा। दैत्य गुरु शुक्राचार्य पहचान गए कि यह साक्षात विष्णु हैं, उन्होंने बलि को दान देने से रोका, लेकिन बलि ने अपने वचन का पालन करने का निर्णय लिया।

वामन देव ने राजा बलि से केवल तीन पग भूमि मांगी। बलि ने हंसते हुए इसे स्वीकार कर लिया। जैसे ही दान का संकल्प हुआ, भगवान वामन ने अपना विराट स्वरूप धारण किया। पहले पग में उन्होंने पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरे पग में उन्होंने स्वर्ग लोक और समस्त आकाश नाप लिया।

अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची। भगवान ने पूछा, “हे राजन्! अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?”

राजा बलि समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हैं। उन्होंने पूर्ण श्रद्धा के साथ अपना सिर झुका दिया और कहा, “प्रभु, अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए।”

भगवान विष्णु बलि की भक्ति और सत्यनिष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को सुतल लोक (पाताल) का स्वामी बना दिया और स्वयं उनके द्वारपाल बनने का वचन दिया। इस प्रकार देवताओं को उनका स्वर्ग वापस मिला और बलि को अमर यश।

मान्यता है कि वामन द्वादशी के दिन जो व्यक्ति इस कथा को सुनता है या व्रत रखता है, उसके अहंकार का नाश होता है और उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

“ॐ वामनाय नमः”

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