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कूर्म द्वादशी 2026 – भगवान विष्णु ने क्यों लिया था कछुआ अवतार? जानें समुद्र मंथन की पूरी कथा और पूजा विधि

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हिंदू धर्म में, भगवान विष्णु के दस अवतारों (Ten Avatars) का विशेष महत्व है। इनमें से एक अद्वितीय और महत्वपूर्ण अवतार है कूर्म अवतार (कछुआ रूप)। कूर्म द्वादशी का पावन पर्व इसी अवतार को समर्पित है। हर साल पौष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को यह व्रत और पूजन किया जाता है।

आइए, विस्तार से जानते हैं कि भगवान विष्णु ने यह रूप क्यों धारण किया था, क्या है समुद्र मंथन की पूरी कथा और कैसे करें इस विशेष दिन पर पूजा-आराधना।

कूर्म द्वादशी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त

साल 2026 में, कूर्म द्वादशी का त्योहार 31 दिसम्बर को मनाया जाएगा। यह दिन भगवान विष्णु के कूर्म स्वरूप की पूजा के लिए अत्यंत शुभ (Auspicious) माना जाता है।

  • आरंभ (Start) – 30 दिसम्बर 2026, सुबह 10 बजकर 19 मिनट से
  • समापन (End) – 31 दिसम्बर 2026, सुबह 8 बजकर 21 मिनट तक
  • पर्व दिवस (Festival Day) – 31 दिसम्बर 2026

क्यों लिया था भगवान विष्णु ने कछुआ अवतार?

भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार (Tortoise Incarnation) मुख्य रूप से समुद्र मंथन की प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए लिया था। यह अवतार सृष्टी में संतुलन (Balance) और स्थिरता (Stability) स्थापित करने का प्रतीक है। कूर्म अवतार की कहानी समझने के लिए हमें ‘समुद्र मंथन’ की पौराणिक कथा को जानना होगा।

समुद्र मंथन की पूरी कथा (The Complete Story of Samudra Manthan)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को आशीर्वाद स्वरूप एक पारिजात पुष्पों की माला भेंट की। अहंकार के वश में होकर इंद्र ने वह माला अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर डाल दी, जिसे हाथी ने सूँघकर पृथ्वी पर फेंक दिया। इस कृत्य से कुपित होकर, महर्षि दुर्वासा ने इंद्र सहित समस्त देवताओं को ‘श्रीहीन’ (शक्ति और समृद्धि से रहित) होने का श्राप दे दिया।
श्राप के कारण देवता निर्बल हो गए और दैत्यों (असुरों) ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास सहायता के लिए गए।

  • विष्णु का सुझाव – भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीर सागर (दूध का महासागर) का मंथन करने का सुझाव दिया। उनका उद्देश्य अमृत प्राप्त करना था, जिसे पीकर देवता अमर हो सकते थे और अपनी शक्तियाँ वापस पा सकते थे।
  • मंदराचल पर्वत का इस्तेमाल – मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी (Churner) बनाया गया और नागराज वासुकि को रस्सी (Rope) बनाया गया। देवता और असुर दोनों मिलकर वासुकि को खींचकर मंथन करने लगे।
  • कूर्म अवतार का प्राकट्य (Appearance) – जैसे ही मंथन शुरू हुआ, मंदराचल पर्वत अपने विशाल भार के कारण समुद्र में धंसने लगा। यह देखकर देवताओं और असुरों में हाहाकार मच गया। सृष्टि पर संकट मंडराने लगा।
  • स्थिरता का आधार – तब, जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने तुरंत एक विशाल कच्छप (कछुए) का रूप धारण किया और समुद्र के गहरे जल में प्रवेश कर गए। उन्होंने अपनी मजबूत और विशाल पीठ पर मंदराचल पर्वत को धारण कर लिया, जिससे पर्वत को मंथन के लिए एक स्थिर आधार (Stable Base) मिल गया।
  • रत्नों की प्राप्ति – इस प्रकार, कूर्म अवतार की सहायता से मंथन सफलतापूर्वक पूरा हुआ और इसमें से चौदह रत्न (14 Gems) निकले, जिनमें कालकूट विष, ऐरावत हाथी, कामधेनु गाय, कल्पवृक्ष, अप्सराएं, देवी लक्ष्मी और अंत में अमृत कलश शामिल थे।
  • इस तरह, भगवान विष्णु के कूर्म अवतार ने समुद्र मंथन को संभव बनाया और देवताओं को अमृत प्राप्त करने में सहायता की। यही कारण है कि यह अवतार स्थिरता, धैर्य (Patience) और आधार शक्ति का प्रतीक है।

कूर्म द्वादशी पूजा विधि (Kurma Dwadashi Puja Vidhi)

कूर्म द्वादशी के दिन भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की पूजा विशेष रूप से कूर्म स्वरूप में की जाती है। यह पूजा जीवन में स्थिरता, सफलता (Success) और सकारात्मकता (Positivity) लाती है।

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल लेकर व्रत या पूजा का संकल्प लें।
  • घर के पूजा स्थल को साफ करें। एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएँ। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार या श्री हरि विष्णु की मूर्ति/तस्वीर स्थापित करें। साथ में माँ लक्ष्मी को भी स्थापित करें।
  • भगवान विष्णु के स्वरूप का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण) से अभिषेक करें।
  • उन्हें पीले पुष्प, तुलसी दल, हल्दी, गोपी चंदन और धूप-दीप अर्पित करें। नैवेद्य (भोग) में फल, मिठाई और विशेष रूप से पीले रंग की वस्तुएं (जैसे बेसन के लड्डू) चढ़ाएं।
  • मंत्र जाप और कथा श्रवण – ‘ॐ नमो नारायणाय’ या ‘ॐ कूर्मदेवाय नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करें।
  • कूर्म अवतार और समुद्र मंथन की कथा का पाठ करें या सुनें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • पूजा के अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करना बहुत ही शुभ होता है।
  • विशेष उपाय – मान्यता है कि कूर्म द्वादशी के दिन चांदी या अष्टधातु से बना हुआ कछुआ (Metal Tortoise) घर या कार्यस्थल पर रखने से धन-धान्य और व्यापार में स्थिरता आती है। इसे रखने से पहले पूजा अवश्य करें।

कूर्म द्वादशी का महत्व (Significance of Kurma Dwadashi)

  • इस दिन व्रत और पूजा करने से मनुष्य को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • कूर्म अवतार स्थिरता का प्रतीक है। इनकी पूजा से जीवन में स्थिरता आती है और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
  • यह दिन दान, धर्म और श्राद्ध कार्यों के लिए भी उत्तम माना जाता है। श्राद्ध करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।

कूर्म द्वादशी का यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी बड़ी कठिनाई (Difficulty) क्यों न आ जाए, धैर्य और दृढ़ता (Perseverance) से हर समस्या का समाधान खोजा जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे भगवान विष्णु ने कच्छप रूप लेकर मंदराचल पर्वत को स्थिर कर दिया था।

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