मेरु त्रयोदशी जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है। वर्ष 2026 में यह पर्व 16 जनवरी (शुक्रवार) को मनाया जाएगा। यह दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ प्रभु) के निर्वाण कल्याणक की स्मृति में मनाया जाता है।
माना जाता है कि इसी दिन भगवान आदिनाथ ने अष्टापद पर्वत (कैलाश पर्वत) पर मोक्ष प्राप्त किया था। “मेरु” शब्द पर्वत का प्रतीक है, जो अडिगता और आध्यात्मिक ऊँचाई को दर्शाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना करते हैं, निर्वाण लाडू चढ़ाते हैं और उपवास रखते हैं। यह पर्व हमें संसार की नश्वरता को त्यागकर मोक्ष मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
|| मेरु त्रयोदशी व्रत की कथा (Meru Trayodashi Vrat Katha PDF) ||
मेरु त्रयोदशी जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है जो पिंगल कुमार की याद में मनाया जाता है। यह पर्व पौष मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को आता है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को निर्वाण भी प्राप्त हुआ था।
जैन धर्म के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ऋषभदेव ने कैवल्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए कई क्षेत्रों की पैदल यात्रा की थी। इस दौरान वे अष्टपद पर्वत पर पहुँचे, जहाँ उन्होंने एक कल्पित गुफा का निर्माण किया और लंबे समय तक तपस्या की। अंततः, उन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ और मोक्ष की प्राप्ति हुई।
एक अन्य कथा के अनुसार, पिंगल कुमार ने पाँच मेरु पर्वतों की परिक्रमा का संकल्प लिया था। मेरु पर्वत जैन ब्रह्मांड विज्ञान में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और उन्हें संसार का केंद्र माना जाता है। पिंगल कुमार की इस यात्रा को उनकी दृढ़ता और त्याग के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
मेरु त्रयोदशी के दिन जैन धर्मावलंबी उपवास रखते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं, और धर्मग्रंथों का पाठ करते हैं। इस दिन का उद्देश्य आत्म-अनुशासन, त्याग, और आध्यात्मिक उन्नति को बढ़ावा देना है।
मेरु त्रयोदशी जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है जो हमें त्याग, तपस्या, और आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि संसार क्षणभंगुर है और मोक्ष ही परम लक्ष्य है।
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