Shri Ganesh

सकट चौथ व्रत कथा और पूजा विधि

Sakat Chauth Vrath Katha Puja Vidhi Hindi

Shri GaneshVrat Katha (व्रत कथा संग्रह)हिन्दी
Share This

Join HinduNidhi WhatsApp Channel

Stay updated with the latest Hindu Text, updates, and exclusive content. Join our WhatsApp channel now!

Join Now

माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला सकट चौथ, हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 6 जनवरी, मंगलवार को मनाया जाएगा। मंगलवार के दिन होने के कारण इसे ‘अंगारक चतुर्थी’ का विशेष संयोग भी प्राप्त हो रहा है, जो इसकी धार्मिक महत्ता को और बढ़ा देता है।

|| सकट चौथ व्रत पूजा विधि ||

  • सुबह स्नान ध्यान करके भगवान गणेश की पूजा करें।
  • इसके बाद सूर्यास्त के बाद स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • गणेश जी की मूर्ति के पास एक कलश में जल भर कर रखें।
  • धूप-दीप, नैवेद्य, तिल, लड्डू, शकरकंद, अमरूद, गुड़ और घी अर्पित करें।
  • तिलकूट का बकरा भी कहीं-कहीं बनाया जाता है।
  • पूजन के बाद तिल से बने बकरे की गर्दन घर का कोई सदस्य काटता है।

सकट चौथ व्रत शुभ मुहूर्त 2026

  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ – 6 जनवरी 2026, सुबह 08:01 बजे।
  • चतुर्थी तिथि समाप्त – 7 जनवरी 2026, सुबह 06:52 बजे।
  • चंद्रोदय का समय – 6 जनवरी की रात लगभग 08:54 बजे।

सकट चौथ कथा

एक देवरानी-जेठानी थी। जेठानी अमीर थी। उसका परिवार भी बड़ा और पूरा-भरा था देवरानी गरीब थी। इतनी गरीब कि जेठानी की सेवा-टहल करके गुजारा करती थी। जो कुछ चूनी-चोकर मिल जाता उसे अपनी झोपड़ी में आकर पका कर खा लेती। फूटे घड़े से पानी पीकर टूटी चारपाई पर सो जाती। सुबह उठकर फिर जेठानी की सेवा करने चली जाती।

साल भर का त्योहार आया। देवरानी भूखी-प्यासी जेठानी की टहल करती रही। रात को जब आने लगी तो और दिनों की तरह चूनी-चोकर भी नहीं दिया। खाली हाथ झोपड़ी में आई। खेत से बथुआ तोड़ लाई। थोड़े से चावल के कन ढूँढ़कर इकट्ठे किये। कन के लड्डू बनाये, बथुआ बनाकर रख लिया। रात को सकट माता आई। टटिया की ओर खड़ी होकर बोली-ब्रह्मणी, खोलो किवाड़ा। देवरानी बोली-चली आओ माता किवाड़े कहाँ हैं। भीतर आते ही सकट माता ने कहा बड़ी भूख लगी है। देवरानी ने कहा माता जो कुछ दिया है खाओ। कन के लड्डू और बथुआ के धोंधा आगे रख दिए।

जब सकट माता छक कर खा चुकीं तो बोलीं पानी तो पिला, देवरानी फूटी गगरी ले आई। पानी पीकर सकट माता ने सोने की इच्छा की। उसने टूटी खाट बाता दी। थोड़ी देर सोने के बाद सकट माता को टट्टी लगी। उन्होंने पूछा टट्टी कहाँ जाऊँ। देवरानी ने कहा माता सारा घर लीपा-पुता है, जहाँ चाहो बैठ जाओ। सारे घर में उन्होंने टट्टी ही टट्टी कर दी फिर भी अभी पूरी तरह निपट नहीं पाई। पूछा अब कहाँ जाऊँ। देवरानी ने कहा अब मेरे सिर पर करो। उन्होंने उसके सिर से पाँव तक टट्टी से नहला दिया और चली गई। सुबह जब देवरानी उठी तो सारी झोपड़ी कंचनमये हो गई। चारो तरफ सोना ही सोना बिखरा पड़ा था। जल्दी-जल्दी बटोर कर रखने लगी पर सोना चुकता ही नहीं था और वह रखते-रखते थक गई।

इधर जब समय से देवरानी नहीं पहुँची तो जेठानी बहुत बिगड़ने लगी। जेठानी बोली कल त्योहार था सारा काम पड़ा है और देवरानी जी कहा अभी पता नहीं है। उसने अपने लड़के को भेजा और कहा जाकर फौरन बुला लाओ। लड़के ने जो खबर दी तो जेठानी का जी धक से रह गया। दौड़ी-दौड़ी पहुँची देखा चारो तरफ सोना ही सोना बिखरा पड़ा है। देवरानी से पूछा किसको घूसा, किसको मूसा ? देवरानी सहज भाव से बोली न किसी को घूसा न मूसा। यह सब सकट माता की कृपा है। जेठानी ने पूछा ऐसी क्या सेवा की तूने जो सकट माता प्रसन्न हो गई। देवरानी बोली मैंने तो कुछ नहीं किया। केवल कन के लड्डू और बथुवा के घोंधा दिये थे खाने को। इस प्रकार उसने सब कुछ बता दिया। जेठानी घर आई और गरीबों की तरह रहने लगी। साल भर बाद जब सकट माता का त्योहार आया तो देवरानी की भाँति कनक के लड्डू बनाये और बथुआ के धोंधा बनाये। फूटी गगरी और टूटी चारपाई रख दी। और सकट माता की राह देखने लगी। रात में सकट माता ने दरवाजा खटखटाया। जेठानी ने कहा माता किवाड़े कहाँ हैं टटिया खोल आ जाओ। सकट माता ने जो पिछले साल देवरानी के साथ किया था वही सब किया। जेठानी ने कहा माता जो कुछ है खाओ पियो तुमसे कुछ छिपा तो नहीं है। सकट माता ने खाया-पिया और टाँग फैलाकर सोई और आधी रात को घर तथा जेठानी को टट्टी से नहला दिया और माता चली गई। सुबह हुई लड़के-बच्चो ने देखा चारो तरफ गन्दगी ही गन्दगी फैली है। जेठानी भी गन्दगी से नहाई निकली, चलना कठिन था। सारा घर बदबू से भर गया। उन्होंने कहा तुमने यहा क्या किया ? जेठानी ने खिसियाकर देवरानी को बुलाया, देवरानी आई। जेठानी ने बड़े ताने से कहा तुमने जो कहा था वह कुछ न हुआ। देवरानी ने कहा तुमने तो बहन गरीबी का नाटक किया था। तुम्हारे पास तो सब कुछ भरा था इसी से सकट माता अप्रसन्न हुई। मेरी गरीबी में उन्हें दया आ गई और सब कुछ दें दिया। तुमने तो मेरी नकल की थी इसी से ऐसा हुआ है।

सकट चौथ व्रत कथा 1

इसे पीछे ये कहानी है कि मां पार्वती एकबार स्नान करने गईं। स्नानघर के बाहर उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी को खड़ा कर दिया और उन्हें रखवाली का आदेश देते हुए कहा कि जब तक मैं स्नान कर खुद बाहर न आऊं किसी को भीतर आने की इजाजत मत देना। गणेश जी अपनी मां की बात मानते हुए बाहर पहरा देने लगे।

उसी समय भगवान शिव माता पार्वती से मिलने आए लेकिन गणेश भगवान ने उन्हें दरवाजे पर ही कुछ देर रुकने के लिए कहा। भगवान शिव ने इस बात से बेहद आहत और अपमानित महसूस किया। गुस्से में उन्होंने गणेश भगवान पर त्रिशूल का वार किया। जिससे उनकी गर्दन दूर जा गिरी।

स्नानघर के बाहर शोरगुल सुनकर जब माता पार्वती बाहर आईं तो देखा कि गणेश जी की गर्दन कटी हुई है। ये देखकर वो रोने लगीं और उन्होंने शिवजी से कहा कि गणेश जी के प्राण फिर से वापस कर दें।

इसपर शिवजी ने एक हाथी का सिर लेकर गणेश जी को लगा दिया । इस तरह से गणेश भगवान को दूसरा जीवन मिला । तभी से गणेश की हाथी की तरह सूंड होने लगी. तभी से महिलाएं बच्चों की सलामती के लिए माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का व्रत करने लगीं।

सकट चौथ व्रत कथा 2

किसी नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार जब उसने बर्तन बनाकर आंवां लगाया तो आंवां नहीं पका। परेशान होकर वह राजा के पास गया और बोला कि महाराज न जाने क्या कारण है कि आंवां पक ही नहीं रहा है। राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा। राजपंडित ने कहा, ”हर बार आंवां लगाते समय एक बच्चे की बलि देने से आंवां पक जाएगा।”

राजा का आदेश हो गया। बलि आरम्भ हुई। जिस परिवार की बारी होती, वह अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता। इस तरह कुछ दिनों बाद एक बुढि़या के लड़के की बारी आई। बुढि़या के एक ही बेटा था तथा उसके जीवन का सहारा था, पर राजाज्ञा कुछ नहीं देखती।

दुखी बुढ़िया सोचने लगी, ”मेरा एक ही बेटा है, वह भी सकट के दिन मुझ से जुदा हो जाएगा।” तभी उसको एक उपाय सूझा। उसने लड़के को सकट की सुपारी तथा दूब का बीड़ा देकर कहा, ”भगवान का नाम लेकर आंवां में बैठ जाना। सकट माता तेरी रक्षा करेंगी।”

सकट के दिन बालक आंवां में बिठा दिया गया और बुढि़या सकट माता के सामने बैठकर पूजा प्रार्थना करने लगी। पहले तो आंवां पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में आंवां पक गया। सवेरे कुम्हार ने देखा तो हैरान रह गया। आंवां पक गया था और बुढ़िया का बेटा जीवित व सुरक्षित था।

सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी जी उठे। यह देख नगरवासियों ने माता सकट की महिमा स्वीकार कर ली। तब से आज तक सकट माता की पूजा और व्रत का विधान चला आ रहा है।

सकट चौथ व्रत कथा 3

एक बुढ़िया थी। वह बहुत ही गरीब और दृष्टिहीन थीं। उसके एक बेटा और बहू थे। वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी। एक दिन गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले-
‘बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।’

बुढ़िया बोली- ‘मुझसे तो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू?’

तब गणेशजी बोले – ‘अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले।’

तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा- ‘गणेशजी कहते हैं ‘तू कुछ मांग ले’ बता मैं क्या मांगू?’

पुत्र ने कहा- ‘मां! तू धन मांग ले।’

बहू से पूछा तो बहू ने कहा- ‘नाती मांग ले।’

तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा, तो उन्होंने कहा- ‘बुढ़िया! तू तो थोड़े दिन जीएगी, क्यों तू धन मांगे और क्यों नाती मांगे। तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी जिंदगी आराम से कट जाए।’

इस पर बुढ़िया बोली- ‘यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती दें, पोता, दें और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।’

यह सुनकर तब गणेशजी बोले- ‘बुढ़िया मां! तुमने तो हमें ठग लिया। फिर भी जो तूने मांगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।’ और यह कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गए। उधर बुढ़िया मां ने जो कुछ मांगा वह सबकुछ मिल गया। हे गणेशजी महाराज! जैसे तुमने उस बुढ़िया मां को सबकुछ दिया, वैसे ही सबको देना।

Read in More Languages:

Found a Mistake or Error? Report it Now

Download सकट चौथ व्रत कथा और पूजा विधि MP3 (FREE)

♫ सकट चौथ व्रत कथा और पूजा विधि MP3
सकट चौथ व्रत कथा और पूजा विधि PDF

Download सकट चौथ व्रत कथा और पूजा विधि PDF

सकट चौथ व्रत कथा और पूजा विधि PDF

Leave a Comment

Join WhatsApp Channel Download App