जगत के पालनहार, मुरली मनोहर श्री कृष्ण की लीलाएँ अनंत हैं। उनका नाम लेते ही मन में एक मधुर बंसी की धुन गूंजने लगती है। हम सबने उनकी बाल लीलाओं, जैसे माखन चोरी या गोवर्धन पर्वत उठाने की कथाएँ सुनी हैं। पर क्या आप जानते हैं, कुछ ऐसी लीलाएँ भी हैं जो समय की परतों में छिप गई हैं? ये वो अनसुनी लीलाएँ (Untold Leelas) हैं, जिनमें प्रेम, ज्ञान और अद्भुत शक्ति का एक दुर्लभ संगम है।
आज इस विशेष ब्लॉग में, हम आपको बंसी वाले की 5 ऐसी अद्वितीय (Unique) और अनसुनी लीलाओं से परिचित कराएंगे, जो न सिर्फ आपका मन मोह लेंगी, बल्कि आपको जीवन का गहरा दर्शन (Philosophy) भी समझाएँगी।
जब गोपियों ने की यशोदा मैया को सुलाने की लीला!
लीला का सार – क्या कभी आपने सुना है कि गोपियों ने मिलकर यशोदा मैया को सुला दिया हो? यह एक अत्यंत मधुर और अनसुनी लीला है।
एक बार श्री कृष्ण देर रात तक बंसी बजाते रहे और घर नहीं लौटे। सारी गोपियाँ कृष्ण के पास जाने को बेचैन थीं, पर यशोदा मैया उन्हें द्वार पर ही रोक लेती थीं। तब राधा जी के नेतृत्व में गोपियों ने एक योजना बनाई। वे सब एक साथ यशोदा मैया के पास गईं और उनसे कृष्ण के लिए विशेष पकवान (Special Delicacies) बनाने का अनुरोध किया।
यशोदा मैया थक गईं, तो गोपियों ने मिलकर मैया के पैर दबाने शुरू किए। वे इतने प्रेम से पैर दबा रही थीं और साथ ही इतनी धीमी, मधुर लोरी (Lullaby) गा रही थीं कि मैया गहरी नींद में सो गईं। जैसे ही मैया सोईं, गोपियाँ चुपचाप द्वार खोलकर कृष्ण से मिलने निकल पड़ीं। यह लीला सिखाती है कि सच्चा प्रेम (Love) पाने के लिए, कभी-कभी युक्ति और कोमल चाल का सहारा लेना पड़ता है।
अर्जुन को ‘शिव’ के रूप में दर्शन देना
लीला का सार – महाभारत के युद्ध से पहले की एक दुर्लभ घटना, जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को भगवान शिव के रूप में दर्शन दिए।
महाभारत के युद्ध से पहले, अर्जुन एक शक्तिशाली दिव्यास्त्र (Divine Weapon) ‘पाशुपतास्त्र’ प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रहे थे। एक बार जब वे ध्यान में लीन थे, तो उन्होंने देखा कि एक शिकारी, एक जंगली सुअर को मारने आ रहा है। सुअर दरअसल एक राक्षस था, जिसका वध जरूरी था।
अर्जुन और शिकारी के बीच उस सुअर को मारने को लेकर विवाद हो गया। तब शिकारी अपने वास्तविक रूप (Original Form) में आए और वह कोई और नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव थे! हैरान कर देने वाली बात यह है कि इस पूरी घटना के पीछे स्वयं श्री कृष्ण की प्रेरणा थी! अर्जुन को यह ज्ञान देने के लिए कि हर शक्ति और हर देवत्व का मूल एक ही है, कृष्ण ने शिव के रूप में लीला की। यह दुर्लभ लीला एकात्मता (Unity of God) का संदेश देती है।
हनुमान जी और कृष्ण की अनोखी भेंट
लीला का सार – द्वापर युग में, रामभक्त हनुमान और कृष्ण की एक अत्यंत मार्मिक भेंट।
एक बार द्वारका में, श्री कृष्ण के परम मित्र उद्धव ने कृष्ण से कहा कि कलयुग के लोग आपको बस ‘माखन चोर’ और ‘रास रचैय्या’ के रूप में ही जानेंगे, आपके ईश्वरीय रूप (Divine Form) को भूल जाएंगे। तब कृष्ण मुस्कुराए और कहा, “मेरे एक भक्त हैं, जो मुझे हर युग में ‘राम’ के रूप में ही याद रखते हैं।”
ठीक उसी समय, हनुमान जी, जो भगवान राम के ध्यान में लीन थे, कृष्ण की पुकार सुनकर द्वारका पहुंचे। उन्हें लगा कि उनके राम ने उन्हें बुलाया है! जैसे ही हनुमान जी आए, कृष्ण ने तुरंत राम का रूप (Form of Rama) धारण कर लिया और हनुमान जी को गले लगा लिया। कुछ ही पलों के लिए हनुमान ने कृष्ण में राम को देखा, और फिर कृष्ण ने वापस अपना रूप ले लिया। यह लीला दर्शाती है कि भगवान अपने भक्तों की भावना का सदैव (Always) सम्मान करते हैं, भले ही युग बदल जाए।
सुदामा के लिए रुक्मिणी का ‘अन्नदान’
लीला का सार – सुदामा की गरीबी दूर करने के लिए, रुक्मिणी जी का एक अनोखा और गोपनीय त्याग।
हम सब जानते हैं कि जब सुदामा द्वारका आए, तो कृष्ण ने उनके चरण धोए और उनका खूब आदर किया। लेकिन एक अनसुनी बात यह है कि जब सुदामा वापस जा रहे थे, तब वे सोचने लगे कि “कृष्ण ने मुझे कुछ नहीं दिया।” तब कृष्ण की पत्नी, रुक्मिणी जी ने एक गुप्त लीला रची।
उन्होंने एक छोटी सी पोटली में, अपने हिस्से का सारा अन्न (Grains) और संपत्ति एक साधु को दान कर दी, यह प्रार्थना करते हुए कि यह दान सुदामा के घर पहुँच जाए। कृष्ण ने यह दान स्वीकार किया और वह चमत्कारिक ढंग से सुदामा के घर पहुँच गया। रुक्मिणी जी ने यह दान इसलिए किया ताकि सुदामा को लगे कि यह फल उनके पुण्य कर्मों (Good Deeds) का है, न कि किसी की दया का। यह लीला निस्वार्थ दान (Selfless Charity) और मित्रता का सर्वोच्च उदाहरण है।
जब कृष्ण ने नारद जी को दी ‘माया’ की झलक
लीला का सार – देवर्षि नारद को जीवन और ‘माया’ (Illusion) का गूढ़ रहस्य समझाना।
एक बार नारद जी को थोड़ा अहंकार हो गया कि वे सबसे बड़े कृष्ण भक्त हैं और माया के बंधन से मुक्त हैं। कृष्ण उनकी इस भावना को समझाना चाहते थे। कृष्ण ने नारद जी को एक प्यास बुझाने के लिए कहा और उन्हें एक दूर के गाँव से पानी लाने को कहा।
नारद जी गाँव पहुँचे और पानी मांगने के लिए एक घर में गए। घर की बेटी को देखते ही नारद जी उन पर मोहित हो गए और वहीं रुककर विवाह कर लिया। उनके कई बच्चे हुए और वर्षों तक वे उसी गृहस्थी में रहे। एक दिन उस गाँव में भयानक बाढ़ आ गई और नारद जी अपने परिवार को बचाने की कोशिश में डूबने लगे।
तभी कृष्ण की आवाज़ आई, “नारद (Narada), कहाँ रह गए? मेरा पानी कहाँ है?” नारद जी ने आँखें खोलीं, तो देखा कि वे उसी स्थान पर खड़े थे, जहाँ कृष्ण ने उन्हें पानी लाने भेजा था। यह सब कुछ पलों की ‘माया’ थी, जो कृष्ण ने उन्हें यह समझाने के लिए रची थी कि संसार (World) और उसके मोह-माया कितने क्षणभंगुर (Ephemeral) हैं। नारद जी का अहंकार टूट गया और उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।
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