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वासुदेव द्वादशी व्रत की पौराणिक कथा

Vasudev Dwadashi Vrat Katha Hindi

Shri KrishnaVrat Katha (व्रत कथा संग्रह)हिन्दी
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वासुदेव द्वादशी का व्रत भगवान कृष्ण को समर्पित है। यह व्रत आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है, जो देवशयनी एकादशी के ठीक अगले दिन पड़ती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से संतान प्राप्ति होती है, खोई हुई संपत्ति वापस मिलती है, सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह व्रत रखने वाले व्यक्ति को मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।

|| वासुदेव द्वादशी व्रत कथा (Vasudev Dwadashi Vrat Katha PDF) ||

एक पौराणिक कथा के अनुसार, माता देवकी ने भगवान कृष्ण को पुत्र रूप में पाने के लिए इस व्रत का पालन किया था। देवकी और वसुदेव कंस द्वारा कारागार में बंद थे और कंस उनके पुत्रों को मारता जा रहा था। इस दुखद स्थिति में नारद जी ने देवकी और वसुदेव को इस वासुदेव द्वादशी व्रत का विधान बताया।

नारद जी ने कहा कि इस व्रत के प्रभाव से उन्हें एक दिव्य बालक की प्राप्ति होगी। नारद जी के सुझाव को मानते हुए देवकी और वसुदेव ने पूरी श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन किया। इसके कुछ ही समय बाद, भगवान विष्णु ने स्वयं भगवान कृष्ण के रूप में उनके आठवें पुत्र के रूप में जन्म लिया।

इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि वासुदेव द्वादशी का व्रत संतान प्राप्ति और उनके उत्तम जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

एक अन्य कथा (वामन अवतार से संबंधित)

कुछ स्थानों पर वासुदेव द्वादशी का संबंध भगवान विष्णु के वामन अवतार से भी बताया जाता है। इस कथा के अनुसार, अत्यंत बलशाली दैत्य राजा बलि ने इंद्रदेव से देवलोक छीन लिया था। सभी देवता भगवान विष्णु के पास सहायता के लिए गए। तब भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे जल्द ही समस्या का समाधान करेंगे।

इसके बाद, भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) के रूप में धरती पर पांचवां अवतार लिया। वामन देव राजा बलि के पास गए, जो उस समय एक यज्ञ कर रहे थे, और उनसे रहने के लिए तीन पग भूमि दान में मांगी। राजा बलि, जो दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे, ने अपने गुरु शुक्राचार्य के मना करने के बावजूद वामन देव को वचन दे दिया।

जैसे ही बलि ने वचन दिया, वामन देव ने अपना आकार इतना बड़ा कर लिया कि पहले ही पग में उन्होंने पूरी पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग में सारा देवलोक ले लिया। तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। वामन देव ने बलि के सिर पर अपना पैर रखा और उन्हें पाताल लोक में रहने का आशीर्वाद दिया। भगवान वामन बलि की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें यह वरदान दिया कि वे उनके द्वारपाल बनकर रहेंगे।

इस कथा के माध्यम से भी भगवान विष्णु की महिमा और भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने की उनकी क्षमता को दर्शाया गया है।

वासुदेव द्वादशी के दिन भगवान कृष्ण, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन दान-पुण्य करने से भी बहुत लाभ होता है। जो भी भक्त श्रद्धा और आस्था के साथ इस व्रत को रखते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।

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