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सूर्य सूक्तम्

Surya Suktam Sanskrit

MiscSuktam (सूक्तम संग्रह)संस्कृत
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ऋग्वेद का सूर्य सूक्तम् भगवान सूर्य की स्तुति में समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली और तेजस्वी सूक्त है। इसमें सूर्य देव को चराचर जगत की आत्मा और समस्त ऊर्जा का स्रोत माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस सूक्त का नियमित पाठ करने से शारीरिक रोगों का नाश होता है, नेत्र ज्योति बढ़ती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

इस दिव्य स्तोत्र में सूर्य के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन है, जो अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। यदि आप अपनी आध्यात्मिक साधना को सुदृढ़ करना चाहते हैं और सूर्य देव की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो Surya Suktam PDF हमारी वेबसाइट से डाउनलोड करें। यह पीडीएफ आपको शुद्ध उच्चारण और अर्थ के साथ पाठ करने में सहायता प्रदान करेगी।

|| सूर्य सूक्तम् (Surya Suktam PDF) ||

नमो॑ मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ चक्ष॑से म॒हो दे॒वाय॒ तदृ॒तं स॑पर्यत ।
दू॒रे॒दृशे॑ दे॒वजा॑ताय के॒तवे॑ दि॒वस्पु॒त्राय॒ सू॒र्या॑य शंसत ॥ १

सा मा॑ स॒त्योक्ति॒: परि॑ पातु वि॒श्वतो॒ द्यावा॑ च॒ यत्र॑ त॒तन॒न्नहा॑नि च ।
विश्व॑म॒न्यन्नि वि॑शते॒ यदेज॑ति वि॒श्वाहापो॑ वि॒श्वाहोदे॑ति॒ सूर्य॑: ॥ २

न ते॒ अदे॑वः प्र॒दिवो॒ नि वा॑सते॒ यदे॑त॒शेभि॑: पत॒रै र॑थ॒र्यसि॑ ।
प्रा॒चीन॑म॒न्यदनु॑ वर्तते॒ रज॒ उद॒न्येन॒ ज्याति॑षा यासि सूर्य ॥ ३

येन॑ सूर्य॒ ज्योति॑षा॒ बाध॑से॒ तमो॒ जग॑च्च॒ विश्व॑मुदि॒यर्षि॑ भा॒नुना॑ ।
तेना॒स्मद्विश्वा॒मनि॑रा॒मना॑हुति॒मपामी॑वा॒मप॑ दु॒ष्ष्वप्न्यं॑ सुव ॥ ४

विश्व॑स्य॒ हि प्रेषि॑तो॒ रक्ष॑सि व्र॒तमहे॑लयन्नु॒च्चर॑सि स्व॒धा अनु॑ ।
यद॒द्य त्वा॑ सूर्योप॒ब्रवा॑महै॒ तं नो॑ दे॒वा अनु॑ मंसीरत॒ क्रतु॑म् ॥ ५

तं नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी तन्न॒ आप॒ इन्द्र॑: शृण्वन्तु म॒रुतो॒ हवं॒ वच॑: ।
मा शूने॑ भूम॒ सूर्य॑स्य स॒न्दृशि॑ भ॒द्रं जीव॑न्तो जर॒णाम॑शीमहि ॥ ६

वि॒श्वाहा॑ त्वा सु॒मन॑सः सु॒चक्ष॑सः प्र॒जाव॑न्तो अनमी॒वा अना॑गसः ।
उ॒द्यन्तं॑ त्वा मित्रमहो दि॒वेदि॑वे॒ ज्योग्जी॒वाः प्रति॑ पश्येम सूर्य ॥ ७

महि॒ ज्योति॒र्बिभ्र॑तं त्वा विचक्षण॒ भास्व॑न्तं॒ चक्षु॑षेचक्षुषे॒ मय॑: ।
आ॒रोह॑न्तं बृह॒तः पाज॑स॒स्परि॑ व॒यं जी॒वाः प्रति॑ पश्येम सूर्य ॥ ८

यस्य॑ ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि के॒तुना॒ प्र चेर॑ते॒ नि च॑ वि॒शन्ते॑ अ॒क्तुभि॑: ।
अ॒ना॒गा॒स्त्वेन॑ हरिकेश सू॒र्याह्ना॑ह्ना नो॒ वस्य॑सावस्य॒सोदि॑हि ॥ ९

शं नो॑ भव॒ चक्ष॑सा॒ शं नो॒ अह्ना॒ शं भा॒नुना॒ शं हि॒मा शं घृणेन॑ ।
यथा॒ शमध्व॒ञ्छमस॑द्दुरो॒णे तत्सू॑र्य॒ द्रवि॑णं धेहि चि॒त्रम् ॥ १०

अ॒स्माकं॑ देवा उ॒भया॑य॒ जन्म॑ने॒ शर्म॑ यच्छत द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे ।
अ॒दत्पिब॑दू॒र्जय॑मान॒माशि॑तं॒ तद॒स्मे शं योर॑र॒पो द॑धातन ॥ ११

यद्वो॑ देवाश्चकृ॒म जि॒ह्वया॑ गु॒रु मन॑सो वा॒ प्रयु॑ती देव॒हेल॑नम् ।
अरा॑वा॒ यो नो॑ अ॒भि दु॑च्छुना॒यते॒ तस्मि॒न्तदेनो॑ वसवो॒ नि धे॑तन ॥ १२

ओं शान्ति॒: शान्ति॒: शान्ति॑: ।

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