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भीष्म द्वादशी व्रत कथा

Bhishma Dwadashi Vrat Katha Hindi

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माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को भीष्म द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। इसे ‘तिल द्वादशी’ भी कहते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत के पितामह भीष्म ने इसी समय के आसपास अपने प्राण त्यागे थे, जिसके बाद भगवान कृष्ण ने उन्हें विशेष वरदान दिया था। यहाँ भीष्म द्वादशी की पौराणिक कथा विस्तार से दी गई है:

|| भीष्म द्वादशी व्रत कथा ||

महाभारत के युद्ध के दौरान जब भीष्म पितामह अर्जुन के बाणों से बिंधकर शरशय्या (बाणों की शय्या) पर लेट गए, तब सूर्य दक्षिणायन था। भीष्म ने संकल्प लिया था कि वे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपने प्राण त्यागेंगे, क्योंकि उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अष्टमी तिथि (भीष्म अष्टमी) को पितामह ने शरीर छोड़ा। जब उनके अंतिम संस्कार और तर्पण की बात आई, तब भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों को उनके पास भेजा। भीष्म पितामह ने भगवान कृष्ण से पूछा कि “हे प्रभु, मैंने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया और धर्म की रक्षा की, फिर भी मुझे इस कष्टकारी शय्या पर क्यों लेटना पड़ा?”

भगवान कृष्ण ने उन्हें उनके पूर्व जन्मों का स्मरण कराया और बताया कि अंबा के प्रति किए गए व्यवहार और द्रौपदी चीर-हरण के समय मौन रहने के कारण उन्हें यह कष्ट मिला। हालांकि, भीष्म के पश्चाताप और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर कृष्ण ने उन्हें आशीर्वाद दिया।

भगवान कृष्ण ने भीष्म पितामह को वरदान दिया कि जो कोई भी माघ शुक्ल द्वादशी के दिन आपका तर्पण और पूजन करेगा, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। चूँकि पितामह भीष्म का कोई अपना पुत्र नहीं था (ब्रह्मचारी होने के कारण), इसलिए कृष्ण ने कहा – “आज से समस्त मानव जाति आपकी संतान के रूप में आपका तर्पण करेगी।”

इसीलिए, भीष्म द्वादशी के दिन भक्त पितामह भीष्म के निमित्त जल, तिल और अर्घ्य अर्पण करते हैं। माना जाता है कि इस दिन पूजन करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है।

|| भीष्म द्वादशी पूजन विधि और नियम ||

इस दिन भगवान लक्ष्मी-नारायण और पितामह भीष्म की पूजा की जाती है:

  • प्रातः काल नदी या शुद्ध जल में तिल मिलाकर स्नान करें।
  • दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितामह भीष्म के निमित्त जल और तिल से तर्पण करें।
  • अर्घ्य देते समय इस मंत्र का उच्चारण करना शुभ माना जाता है: वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृत्यप्रवराय च। अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे।।
  • इस दिन तिल, गुड़, और वस्त्र का दान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
  • कई लोग इस दिन पूर्ण उपवास रखते हैं और रात्रि में भगवान विष्णु के नाम का संकीर्तन करते हैं।

माना जाता है कि भीष्म द्वादशी का व्रत करने से व्यक्ति को आरोग्य, ऐश्वर्य और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो लोग अपने पितरों की शांति चाहते हैं, उनके लिए यह दिन ‘गया श्राद्ध’ के समान ही प्रभावशाली माना गया है।

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