धनतेरस की पौराणिक कथाएँ मुख्य रूप से दो हैं। एक कथा के अनुसार, कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इन्हें आयुर्वेद और चिकित्सा का देवता माना जाता है। इनके प्रकट होने के उपलक्ष्य में यह पर्व मनाया जाता है।
दूसरी कथा यमराज से जुड़ी है। एक पौराणिक कथा में, यमदूतों के पूछने पर यमराज ने बताया था कि धनतेरस पर यम के नाम का दीपक जलाने और विधि-पूर्वक पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। इसलिए इस दिन दीपदान का भी महत्व है। इन कथाओं के कारण ही धनतेरस पर धन, स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए पूजा की जाती है।
|| धनतेरस की पौराणिक कथा (Dhanteras ki katha PDF) ||
धनतेरस का त्योहार कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को बड़े श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है। इस दिन धनवंतरी, माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा होती है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जिसे जानना दिलचस्प है।
कहानी कुछ इस तरह है कि एक बार भगवान विष्णु मृत्युलोक की यात्रा पर जा रहे थे। लक्ष्मी जी ने उनसे साथ चलने का आग्रह किया। विष्णु जी ने कहा, “ठीक है, लेकिन जो मैं कहूं, वही करना होगा।” लक्ष्मी जी मान गईं और उनके साथ यात्रा पर निकल पड़ीं। थोड़ी देर बाद विष्णु जी ने लक्ष्मी जी से कहा, “तुम यहीं रुको, मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना।” लेकिन जैसे ही भगवान आगे बढ़े, लक्ष्मी जी की जिज्ञासा बढ़ गई और वह भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।
रास्ते में उन्हें सरसों का एक खेत मिला जिसमें सुंदर फूल खिले थे। लक्ष्मी जी ने कुछ फूल तोड़े और अपने श्रृंगार में उनका इस्तेमाल किया। फिर आगे बढ़ते हुए उन्होंने गन्ने का खेत देखा और कुछ गन्ने तोड़कर उनका रस पीने लगीं। तभी भगवान विष्णु आ गए और लक्ष्मी जी पर नाराज हो गए। उन्होंने कहा, “मैंने तुम्हें उधर जाने से मना किया था, लेकिन तुम मेरी बात नहीं मानीं। अब तुम्हें इस किसान के यहां 12 साल तक सेवा करनी होगी।” इसके बाद भगवान विष्णु उन्हें वहीं छोड़कर चले गए।
लक्ष्मी जी उस किसान के घर रहने लगीं। एक दिन लक्ष्मी जी ने किसान की पत्नी से कहा, “तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई लक्ष्मी की मूर्ति की पूजा करो, फिर रसोई बनाना। इससे तुम्हें जो चाहोगी, मिलेगा।” किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया और लक्ष्मी जी की कृपा से अगले ही दिन से उनका घर धन-धान्य से भर गया।
12 साल बाद, जब लक्ष्मी जी जाने को तैयार हुईं, तो भगवान विष्णु उन्हें लेने आए। किसान ने लक्ष्मी जी को जाने नहीं दिया। भगवान विष्णु ने कहा, “लक्ष्मी जी चंचल हैं, कहीं रुकती नहीं हैं। वे मेरे शाप के कारण 12 साल से तुम्हारी सेवा कर रही थीं, अब उनका समय पूरा हो गया है।” लेकिन किसान ने फिर भी उन्हें रोकने की कोशिश की।
तब लक्ष्मी जी ने कहा, “अगर तुम मुझे रोकना चाहते हो, तो कल तेरस के दिन घर को अच्छे से साफ करो, रात में घी का दीपक जलाओ और मेरा पूजन करो। एक तांबे के कलश में रुपए भरकर रखना, मैं उसमें निवास करूंगी। इस पूजा के बाद मैं एक साल तक तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी।” ऐसा कहकर लक्ष्मी जी प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं।
अगले दिन किसान ने लक्ष्मी जी के बताए अनुसार पूजा की, और उसका घर फिर से धन-धान्य से भर गया। तभी से हर साल तेरस के दिन लक्ष्मी जी की पूजा की परंपरा शुरू हुई।
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