दुर्गा विसर्जन शारदीय नवरात्रि के उत्सव का समापन बिंदु है। वर्ष 2026 में, माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन 20 अक्टूबर को किया जाएगा। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक ‘विजयादशमी’ के रूप में मनाया जाता है।
यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह जीवन के एक गहरे दार्शनिक (Philosophical) सत्य को दर्शाता है: सृजन, स्थिति और संहार का चक्र। हर त्योहार जो हमें प्रकृति और अध्यात्म से जोड़ता है, वह अपने आप में रहस्य और विज्ञान को समेटे हुए है। आइए, जानते हैं दुर्गा विसर्जन 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त और इस परंपरा से जुड़े धार्मिक और वैज्ञानिक रहस्यों को।
दुर्गा विसर्जन 2026 – तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि के ठीक बाद, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दुर्गा विसर्जन किया जाता है।
- दुर्गा विसर्जन – मंगलवार, अक्टूबर 20, 2026 को
- दुर्गा विसर्जन मुहूर्त – 01:14 PM से 03:30 PM (अवधि – 02 घण्टे 16 मिनट्स)
- दशमी तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 20, 2026 को 12:50 PM बजे
- दशमी तिथि समाप्त – अक्टूबर 21, 2026 को 02:11 PM बजे
- श्रवण नक्षत्र प्रारम्भ – अक्टूबर 19, 2026 को 03:38 PM बजे
- श्रवण नक्षत्र समाप्त – अक्टूबर 20, 2026 को 06:02 PM बजे
धार्मिक रहस्य – जल में ही क्यों होता है विसर्जन?
सनातन धर्म में किसी भी देव प्रतिमा को जल में विसर्जित करने की परंपरा का गहरा आध्यात्मिक (Spiritual) और पौराणिक (Mythological) आधार है।
देवी की कैलाश वापसी – पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ दुर्गा हर वर्ष नवरात्रि के दौरान पृथ्वी पर अपने मायके आती हैं। नौ दिन तक भक्तों के बीच रहकर वे उनकी पूजा स्वीकार करती हैं और बुराई पर विजय (महिषासुर मर्दन) प्राप्त करती हैं। विजयादशमी पर वे अपने पति, भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत (Kailash Parvat) लौट जाती हैं।
- रहस्य – जल को पृथ्वी और आकाश के बीच एक सेतु (Bridge) माना गया है। विसर्जन के माध्यम से भक्त माँ को एक प्रकार से जलमार्ग से उनकी दिव्य यात्रा (Divine Journey) के लिए विदा करते हैं। यह केवल मूर्ति का त्याग नहीं है, बल्कि माँ के निराकार स्वरूप को पुनः प्रकृति में समाहित करना है।
पंचतत्व और जीवन की अनित्यता – हमारी मूर्तियाँ मिट्टी (Clay) से बनती हैं, जो पृथ्वी का प्रतीक है। विसर्जन इस बात का दार्शनिक प्रमाण है कि सृष्टि की हर भौतिक वस्तु पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बनी है और अंततः उन्हीं में विलीन हो जाती है।
- रहस्य – यह अनुष्ठान हमें सिखाता है कि यह संसार अनित्य (Transient) है। यह नश्वर शरीर और भौतिक आसक्तियों को छोड़कर आत्मिक यात्रा पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा देता है। विसर्जन का अर्थ है ‘त्याग’ और ‘पूर्णता’। जब पूजा पूर्ण हो जाती है, तो हम देवत्व को वापस उसके मूल, निराकार स्वरूप में लौटाते हैं।
शक्ति का हस्तांतरण – नवरात्रि के दौरान प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है, जिससे वह साक्षात देवी का रूप बन जाती है। विसर्जन के समय, भक्त मंत्रों और विधि-विधान से देवी से निवेदन करते हैं कि वे मूर्ति को छोड़कर परम ब्रह्म में लीन हो जाएं और अपनी सारी शक्ति (Power) जल में विसर्जित होने दें।
- रहस्य – मान्यता है कि जब मूर्ति जल में घुलती है, तो उस नौ दिन की अर्जित सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) जल के माध्यम से पूरे वातावरण में फैल जाती है, जिससे पर्यावरण शुद्ध होता है और उस जल का उपयोग करने वालों को आशीर्वाद मिलता है।
वैज्ञानिक रहस्य – विसर्जन और पर्यावरण (Environment) का संतुलन
आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Modern Scientific Perspective) से देखें, तो जल विसर्जन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है, जिसे अब पर्यावरण के अनुकूल (Eco-Friendly) बनाने की आवश्यकता है। हालांकि, मूल परंपरा में गहरा वैज्ञानिक आधार छिपा है:
बायोडिग्रेडेबल सामग्री (Biodegradable Materials) – परंपरागत रूप से, माँ दुर्गा की मूर्तियाँ शुद्ध मिट्टी (Pure Clay) और प्राकृतिक रंगों (Natural Colours) से बनाई जाती थीं।
- विज्ञान – शुद्ध मिट्टी और प्राकृतिक रंग जल में आसानी से घुल जाते हैं और जल प्रदूषण (Water Pollution) नहीं करते। मिट्टी का विसर्जन वास्तव में जल में नए खनिज और पोषक तत्व (Nutrients) प्रदान करता है, जो जलीय जीवन के लिए हानिकारक नहीं होते। यह एक प्रकार से प्राकृतिक चक्र को पूर्ण करता है। (Natural Cycle)
जल का शुद्धिकरण – प्राचीन काल में, पूजा में उपयोग की जाने वाली कई सामग्री – जैसे कि हल्दी (Turmeric), कुमकुम, चंदन, और विभिन्न जड़ी-बूटियाँ (Herbs) – जल में घुलने पर प्राकृतिक रूप से शुद्धिकरण (Purification) का कार्य करती थीं।
- विज्ञान – नवरात्रि का समय मौसम परिवर्तन (Seasonal Change) का समय होता है। आयुर्वेद और विज्ञान दोनों मानते हैं कि इस दौरान जल में विषैले तत्व (Toxins) बढ़ सकते हैं। इन प्राकृतिक पदार्थों का जल में मिलना, साथ ही मूर्ति निर्माण में उपयोग होने वाली शुद्ध मिट्टी, पानी के pH स्तर को बनाए रखने में मदद करती थी।
मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव – नौ दिनों तक सामूहिक पूजा और दसवें दिन विसर्जन यात्रा एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक (Psychological) आवश्यकता भी पूरी करती है।
- विज्ञान – सामूहिक उत्सव, संगीत (ढोल-नगाड़े), और नृत्य (सिंदूर खेला, शोभा यात्रा) से लोगों में तनाव कम होता है। माँ को विदा करने की भावना भावनात्मक शुद्धि (Emotional Cleansing) का कार्य करती है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में हर सुंदर चीज़ का अंत निश्चित है, जिससे हम वर्तमान (Present) के महत्व को समझते हैं।
Found a Mistake or Error? Report it Now

