यहाँ यशोदा जयंती की पूर्ण व्रत कथा दी गई है। यह पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। माता यशोदा भगवान कृष्ण की वात्सल्यमयी मां के रूप में पूजनीय हैं।
|| यशोदा जयंती व्रत कथा (Yashoda Jayanti Vrat Katha PDF) ||
पौराणिक मान्यताओं और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, यशोदा जयंती के पीछे की कथा माता यशोदा के पूर्व जन्म और उनकी तपस्या से जुड़ी है।
पूर्व जन्म की कथा (द्रोण और धरा):
प्राचीन काल में, द्रोण नामक एक अष्ट-वसु (देवताओं की एक श्रेणी) थे और उनकी पत्नी का नाम धरा था। वे दोनों ही बहुत धार्मिक और ईश्वर में श्रद्धा रखने वाले थे। उनके मन में ईश्वर को पुत्र रूप में पाने की प्रबल इच्छा थी।
इस इच्छा की पूर्ति के लिए, द्रोण और धरा ने भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या करने का निर्णय लिया। वे वन में गए और वहां अन्न-जल त्याग कर कठोर तपस्या करने लगे। उनकी निष्ठा और भक्ति देखकर सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा प्रसन्न हुए और उनके सामने प्रकट हुए।
ब्रह्मा जी ने उनसे पूछा, “हे वसु! मैं तुम्हारी तपस्या से अति प्रसन्न हूँ। मांगो, तुम क्या वरदान चाहते हो?”
इस पर द्रोण और धरा ने हाथ जोड़कर कहा, “हे प्रभु! हम दोनों की केवल एक ही अभिलाषा है। हम चाहते हैं कि हमें पृथ्वी पर ऐसे जन्म मिले, जिसमें साक्षात श्री हरि (भगवान विष्णु) हमारे पुत्र बनें और हम उन्हें अपने वात्सल्य प्रेम से पाल सकें।”
ब्रह्मा जी ने ‘तथास्तु’ कहा और उन्हें आशीर्वाद दिया कि, “द्वापर युग में तुम्हारा जन्म गोकुल में होगा। तब श्री हरि के अवतार श्री कृष्ण तुम्हारे घर में बाल लीलाएं करेंगे और तुम्हें उनका लालन-पालन करने का सुख प्राप्त होगा।”
समय बीतने पर द्वापर युग में, द्रोण का जन्म नन्द बाबा के रूप में और धरा का जन्म माता यशोदा के रूप में हुआ। भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के घर जन्म लिया, लेकिन वासुदेव जी ने उन्हें रातों-रात नन्द बाबा के घर गोकुल में छोड़ दिया।
इस प्रकार, ब्रह्मा जी के वरदान के फलस्वरूप माता यशोदा को श्री कृष्ण को पुत्र रूप में पालने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसीलिए कहा जाता है कि देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया, लेकिन यशोदा ने उन्हें ‘कान्हा’ बनाया।
|| यशोदा जयंती व्रत का महत्व ||
- संतान सुख – मान्यता है कि जो महिलाएं यशोदा जयंती के दिन सच्चे मन से व्रत रखती हैं और माता यशोदा व बाल गोपाल की पूजा करती हैं, उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।
- संतान की रक्षा – माताएं अपनी संतानों की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और उज्ज्वल भविष्य के लिए यह व्रत करती हैं।
- वात्सल्य भाव – यह दिन भगवान और भक्त के बीच वात्सल्य प्रेम (माता-पुत्र का प्रेम) का प्रतीक है।
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