इष्टि (Ishti) का शाब्दिक अर्थ है “इच्छा” या “यज्ञ”। हिंदू धर्म और कर्मकांड में ‘इष्टि’ उस छोटे यज्ञ को कहा जाता है जो किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति के लिए किया जाता है।
पौराणिक संदर्भों में इष्टि कथा का संबंध मुख्य रूप से राजा मनु और उनके द्वारा किए गए पुत्रकामेष्टि यज्ञ से जुड़ा है, जिससे उनकी पुत्री ‘इला’ का जन्म हुआ। यहाँ इस प्रसिद्ध कथा का विवरण दिया गया है:
|| इष्टि पौराणिक कथा ||
सृष्टि के प्रारंभ में वैवस्त मनु और उनकी पत्नी श्रद्धा की कोई संतान नहीं थी। वंश वृद्धि की कामना से मनु ने महर्षि वशिष्ठ के निर्देशन में एक यज्ञ का आयोजन किया। इस विशेष यज्ञ को ‘इष्टि’ कहा गया।
यज्ञ के दौरान, मनु की पत्नी श्रद्धा के मन में एक इच्छा जाग्रत हुई। वे चाहती थीं कि उन्हें एक पुत्री प्राप्त हो। उन्होंने यज्ञ कर रहे होता (पुरोहित) से एकांत में निवेदन किया कि वे यज्ञ की आहुतियां इस प्रकार दें कि उन्हें कन्या रत्न की प्राप्ति हो।
शास्त्रों के अनुसार, वह यज्ञ पुत्र प्राप्ति के लिए किया जा रहा था, लेकिन पुरोहित ने श्रद्धा की इच्छा का मान रखते हुए आहुति के मंत्रों में सूक्ष्म परिवर्तन कर दिया। परिणामस्वरूप, यज्ञ की अग्नि से एक अत्यंत सुंदर कन्या प्रकट हुई, जिसका नाम ‘इला’ रखा गया।
जब राजा मनु ने देखा कि पुत्र के स्थान पर कन्या का जन्म हुआ है, तो वे दुखी हुए और उन्होंने गुरु वशिष्ठ से इसका कारण पूछा। वशिष्ठ ने ध्यान लगाकर देखा और बताया कि यह पुरोहित के संकल्प और श्रद्धा की इच्छा का परिणाम है।
राजा मनु को निराश देखकर महर्षि वशिष्ठ ने अपनी तपोबल से भगवान शिव की स्तुति की और इला को पुरुष रूप में परिवर्तित करने का वरदान प्राप्त किया। इसके बाद इला ‘सुद्युम्न’ नाम का पुरुष बन गई।
यह कथा हमें सिखाती है कि – यज्ञ (इष्टि) में कर्ता और साधक का संकल्प सबसे प्रभावी होता है।, श्रद्धा और भक्ति से की गई ‘इष्टि’ कभी निष्फल नहीं होती, भले ही उसका स्वरूप बदल जाए।
|| इष्टि के प्रकार (सामान्य जानकारी) ||
कर्मकांडों में कई प्रकार की इष्टियाँ प्रसिद्ध हैं, जैसे:
- पुत्रकामेष्टि – संतान प्राप्ति हेतु।
- दर्शपूर्णमास इष्टि – अमावस्या और पूर्णिमा पर की जाने वाली नियमित इष्टि।
- कारीरी इष्टि – वर्षा प्राप्त करने के लिए।
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