मूर्त्यष्टकस्तोत्रम्
|| मूर्त्यष्टकस्तोत्रम् || भार्गव उवाच त्वं भाभिराभिरभिभूय तमस्समस्त- मस्तं नयस्यभिमतानि निशाचराणाम् । देदीप्यसे दिवमणे गगने हिताय लोकत्रयस्य जगदीश्वर तन्नमस्ते ॥ १॥ भार्गवने कहा–सूर्यस्वरूप भगवन्! आप त्रिलोकीका हित करनेके लिये आकाशमें प्रकाशित होते हैं और अपनी इन किरणोंसे समस्त अन्धकारको अभिभूत करके रातमें विचरनेवाले असुरोंका मनोरथ नष्ट कर देते हैं । जगदीश्वर! आपको नमस्कार है ॥…



