स्कन्द षष्ठी व्रत कथा व पूजा विधि PDF हिन्दी
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Shri Karthikeya ✦ Vrat Katha (व्रत कथा संग्रह) ✦ हिन्दी
स्कन्द षष्ठी व्रत कथा व पूजा विधि हिन्दी Lyrics
भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय (स्कन्द) को समर्पित स्कन्द षष्ठी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब तारकासुर नामक दैत्य के अत्याचारों से देवता त्रस्त हो गए थे, तब भगवान कार्तिकेय ने इसी दिन उसका वध कर देवलोक की रक्षा की थी।
यह व्रत विशेष रूप से संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए रखा जाता है। स्कन्द षष्ठी के दिन विधि-विधान से पूजन करने और कथा सुनने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यदि आप इस पावन कथा को विस्तार से पढ़ना चाहते हैं, तो Skand Shashthi Vrat Katha PDF हमारी वेबसाइट से डाउनलोड करें और भगवान कार्तिकेय की कृपा प्राप्त करें।
|| स्कन्द षष्ठी व्रत पूजा विधि ||
- सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करें और भगवान कार्तिकेय की बालस्वरूप प्रतिमा स्थापित करें।
- इसके बाद दीपक जलाएं और व्रत का संकल्प लें।
- ऐसा करने के बाद भगवान कार्तिकेय को चंदन, धूप, दीप, पुष्प, वस्त्र इत्यादि अर्पित करें।
- फिर उन्हें एक मिष्ठान का भोग लगाएं।
- आज के दिन माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व है।
- पूजा के बाद अंत में भगवान कार्तिकेय की आरती करें।
|| स्कन्द षष्ठी व्रत कथा (Skand Shashthi Vrat Katha PDF) ||
कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार हो रहे राक्षसों के आतंक से सभी देवतागण परेशान थे। ऐसे में देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद की गुहार मांगी।
देवताओं ने अपनी समस्या का पूरा वृतांत ब्रह्मा जी को बताया। जिसपर ब्रह्मा जी ने कहा कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, लेकिन उस काल चक्र में माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे। ऐसे में इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद मांगी।
जिसके बाद कामदेव ने खुद भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग कर दिया। और फिर आखिरकार भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया। विवाह के बाद वो दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे।
उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ।
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