जब हम भक्ति की बात करते हैं, तो अक्सर शांत प्रार्थना या ध्यान की छवि मन में आती है। लेकिन दक्षिण भारत और विशेषकर तमिल समुदायों के बीच एक ऐसा त्योहार मनाया जाता है, जहाँ भक्ति ‘साहस’ और ‘कष्ट’ की सीमाओं को पार कर जाती है। इस त्योहार का नाम है – थाई पूसम (Thaipusam)।
हजारों की संख्या में श्रद्धालु, सड़कों पर नाचते-गाते, ढोल की थाप पर और अपने शरीर को सुइयों (Vel) से बींधे हुए आगे बढ़ते हैं। आखिर क्यों लोग खुद को इतना कष्ट देते हैं? इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है? आइए, इस अद्भुत परंपरा की गहराइयों में उतरते हैं।
थाई पूसम का अर्थ और समय
थाई पूसम दो शब्दों से मिलकर बना है:
- थाई (Thai) – तमिल कैलेंडर का दसवां महीना।
- पूसम (Pusam) – एक विशेष नक्षत्र (पुष्य नक्षत्र), जो इस समय अपने चरम पर होता है।
मान्यता है कि इसी दिन पुष्य नक्षत्र के दौरान भगवान मुरुगन को ‘शक्ति वेल’ (अमोघ शक्ति वाला भाला) प्राप्त हुआ था। वर्ष 2026 में यह उत्सव 1 फरवरी को मनाया जाएगा।
थाई पूसम पौराणिक कथा
थाई पूसम की पूरी कहानी भगवान मुरुगन और असुर तारकासुर (या शूरपद्मन) के युद्ध के इर्द-गिर्द घूमती है। प्राचीन काल में, असुरों के अत्याचार से देवता त्रस्त थे। असुरों का राजा शूरपद्मन इतना शक्तिशाली था कि उसे केवल भगवान शिव का अंश ही पराजित कर सकता था। तब भगवान शिव के तेज से मुरुगन (कार्तिकेय) का जन्म हुआ।
युद्ध पर प्रस्थान करने से पहले, माता पार्वती ने अपने पुत्र मुरुगन को एक दिव्य शस्त्र प्रदान किया, जिसे ‘वेल’ (Vel) कहा जाता है। यह केवल एक भाला नहीं था, बल्कि माता पार्वती की शक्तियों का साक्षात स्वरूप था। इसी ‘वेल’ की सहायता से भगवान मुरुगन ने असुरों का संहार किया और अधर्म का अंत किया। इसीलिए थाई पूसम को बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की जीत के रूप में मनाया जाता है।
शरीर को कष्ट क्यों दिया जाता है?
थाई पूसम के दौरान श्रद्धालु अपने गालों, जीभ और शरीर के अन्य हिस्सों में लोहे की लंबी सुइयां या भाले (Vel) चुभाते हैं। इसके पीछे कई गहरे आध्यात्मिक कारण हैं:
- ‘वेल’ की शक्ति का स्मरण – श्रद्धालु अपने शरीर में जो सुइयां चुभाते हैं, वे भगवान मुरुगन के शस्त्र ‘वेल’ का प्रतीक हैं। उनका मानना है कि ‘वेल’ न केवल बाहरी शत्रुओं को मारता है, बल्कि मनुष्य के भीतर के विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) का भी नाश करता है।
- अहंकार का विसर्जन (Kavadi Attam) – भक्त अपने कंधों पर ‘कावड़ी’ उठाते हैं। यह एक लकड़ी का ढांचा होता है जिसे फूलों और मोर के पंखों से सजाया जाता है। भारी कावड़ी उठाना और पैदल चलना इस बात का प्रतीक है कि भक्त ने अपना सारा अहंकार और भार भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया है।
- दर्द पर नियंत्रण और मौन – जीभ और गालों को बींधने का एक उद्देश्य ‘मौन’ धारण करना भी है। जब जीभ छिद जाती है, तो भक्त बोल नहीं पाता, जिससे उसकी पूरी एकाग्रता भगवान मुरुगन के चरणों में लग जाती है। यह दर्शाता है कि ईश्वर की भक्ति में लीन व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा का अहसास नहीं होता।
उत्सव के मुख्य आकर्षण – केवल भारत नहीं, विदेशों में भी धूम
थाई पूसम केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। यह उन देशों में भी बड़े स्तर पर मनाया जाता है जहाँ तमिल संस्कृति रची-बसी है:
- बटू केव्स (Batu Caves, Malaysia) – यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी मुरुगन प्रतिमाओं में से एक है। थाई पूसम पर यहाँ का दृश्य अद्भुत होता है, जहाँ लाखों लोग सीढ़ियां चढ़कर गुफा मंदिर तक पहुँचते हैं।
- सिंगापुर – यहाँ भी भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।
- तमिलनाडु (पलानी) – मुरुगन के छह निवासों (आरुपड़ाई वीडू) में से एक, पलानी में इस दिन जनसैलाब उमड़ता है।
क्या यह केवल अंधविश्वास है?
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से देखें तो यह हैरतअंगेज है कि सुइयां चुभाने के बाद भी भक्तों के घावों से खून बहुत कम निकलता है और वे बिना किसी एंटीबायोटिक के जल्दी ठीक हो जाते हैं। भक्तों के लिए यह ‘मिरेकल’ (चमत्कार) है, जो केवल मुरुगन की कृपा से संभव है। उनके लिए यह कष्ट नहीं, बल्कि अपने आराध्य के प्रति प्रेम व्यक्त करने का एक तरीका है।
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