|| दुर्गा अष्टक स्तोत्र ||
वन्दे निर्बाधकरुणामरुणां शरणावनीम्।
कामपूर्णजकाराद्य- श्रीपीठान्तर्निवासिनीम्।
प्रसिद्धां परमेशानीं नानातनुषु जाग्रतीम्।
अद्वयानन्दसन्दोह- मालिनीं श्रेयसे श्रये।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादौ प्रतिव्यक्ति विलक्षणाम्।
सेवे सैरिभसम्मर्दरक्षणेषु कृतक्षणाम्।
तत्तत्कालसमुद्भूत- रामकृष्णादिसेविताम्।
एकधा दशधा क्वापि बहुधा शक्तिमाश्रये।
स्तवीमि परमेशानीं महेश्वरकुटुम्बिनीम्।
सुदक्षिणामन्नपूर्णां लम्बोदरपयस्विनीम्।
मेधासाम्राज्यदीक्षादि- वीक्षारोहस्वरूपिकाम्।
तामालम्बे शिवालम्बां प्रसादरूपिकाम्।
अवामा वामभागेषु दक्षिणेष्वपि दक्षिणा।
अद्वयापि द्वयाकारा हृदयाम्भोजगावतात्।
मन्त्रभावनया दीप्तामवर्णां वर्णरूपिणीम्।
परां कन्दलिकां ध्यायन् प्रसादमधिगच्छति।
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