भारतीय परिवारों में बचपन से ही हमें कुछ आदतें (Habits) सिखाई जाती हैं। जैसे “जूते बाहर उतारो,” “बड़ों के पैर छुओ,” और एक बहुत ही सामान्य नियम – “बाहर से आए हो, तो पहले हाथ-पैर धो लो।” लेकिन जब बात मंदिर (Temple) की आती है, तो थोड़ी दुविधा (Confusion) होती है। हम मंदिर जाते समय तो नहा-धोकर जाते ही हैं, फिर वहां से लौटने के बाद दोबारा हाथ-पैर धोने की क्या जरूरत? कुछ लोग कहते हैं कि इससे “पुण्य धुल जाता है,” तो कुछ इसे “सफाई” मानते हैं।
आखिर सच क्या है? क्या मंदिर से लौटकर हाथ-पैर धोना सही है या गलत? चलिए, आज इस पहेली को हाइजीन (Hygiene), विज्ञान (Science) और अध्यात्म (Spirituality) के तराजू पर तौलते हैं।
विज्ञान और हाइजीन का नजरिया (The Scientific & Hygiene Perspective)
सबसे पहले और सबसे व्यावहारिक (Practical) कारण पर बात करते हैं। पुराने जमाने में और आज के जमाने में भी, मंदिर एक सार्वजनिक स्थान (Public Place) है।
- संक्रमण का खतरा (Risk of Infection) – मंदिर में हजारों लोग आते हैं। वहां हम अपने जूते-चप्पल बाहर उतारते हैं और नंगे पैर (Barefoot) अंदर जाते हैं। फर्श पर हजारों लोगों के पैरों की धूल, पसीना और कई तरह के बैक्टीरिया (Bacteria) होते हैं।
- धूल और गंदगी – भले ही मंदिर का फर्श साफ दिखता हो, लेकिन नग्न आंखों से न दिखने वाले कीटाणु हमारे पैरों में चिपक जाते हैं।
- घर की सुरक्षा – जब हम मंदिर से लौटते हैं, तो वही गंदे पैर लेकर अगर हम सीधे बेडरूम या किचन में घुस जाएं, तो हम बाहरी गंदगी को अपने घर के पवित्र और साफ वातावरण में आमंत्रित कर रहे हैं।
- लॉजिक – इसलिए, मंदिर से आने के बाद कम से कम पैरों को अच्छे से धोना एक ‘साइंटिफिक जरूरत’ है, ताकि आप बाहरी कीटाणुओं को घर के सोफे या बिस्तर तक न ले जाएं।
ऊर्जा का विज्ञान (The Science of Energy)
यह बिंदु थोड़ा गहरा है और इसे समझने के लिए हमें ‘ऑरा’ (Aura) या ऊर्जा क्षेत्र को समझना होगा।
मंदिर वह जगह है जहां हर तरह का इंसान आता है। कोई खुश होकर भगवान को धन्यवाद देने आता है, तो कोई बहुत दुखी होकर अपना रोना रोने आता है।
- भीड़ की ऊर्जा (Energy of the Crowd) – जब आप भीड़भाड़ वाले मंदिर में होते हैं, तो आप अनजाने में कई तरह की ऊर्जाओं के संपर्क (Contact) में आते हैं। वहां नकारात्मक (Negative) और सकारात्मक (Positive) दोनों तरह की वाइब्स होती हैं।
- संतुलन बनाना – कुछ आध्यात्मिक जानकारों का मानना है कि घर लौटकर हाथ-पैर धोने से आप उस “भीड़ के प्रभाव” को अपने शरीर से हटा देते हैं और अपनी सामान्य अवस्था (Normal State) में आ जाते हैं। यह एक तरह का ‘रीसेट बटन’ है।
क्या ‘पुण्य’ धुल जाता है? (Does it wash away blessings?)
यह सबसे बड़ा सवाल है! बहुत से बुज़ुर्ग कहते हैं कि मंदिर से आकर तुरंत नहीं नहाना चाहिए या हाथ-पैर नहीं धोने चाहिए, वरना दर्शन का फल चला जाता है। इसमें भी एक बारीक सच छिपा है।
- तिलक और प्रसाद का नियम – शास्त्रों के अनुसार, मंदिर से लौटने के बाद तुरंत स्नान (Bath) नहीं करना चाहिए और माथे पर लगे तिलक को नहीं धोना चाहिए। क्योंकि तिलक आज्ञा चक्र (Agnya Chakra) को सक्रिय रखता है और प्रसाद की पवित्रता शरीर में रहनी चाहिए।
- पैरों की सफाई अलग है – लेकिन, ‘पैरों को धोना’ और ‘नहाना’ दो अलग बातें हैं। गंदे पैरों को धोना शारीरिक शुद्धि (Physical Cleansing) है, इसका आपके पुण्य या आशीर्वाद के धुलने से कोई लेना-देना नहीं है।
- संतुलित राय – आप घर आकर अपने पैर और हाथ (कोहनी तक) पानी से धो सकते हैं ताकि धूल-मिट्टी साफ हो जाए, लेकिन माथे का तिलक लगा रहने दें और तुरंत पूरा स्नान करने से बचें।
एक और रोचक तथ्य – श्मशान vs मंदिर
हमें अक्सर मंदिर और श्मशान (Cremation Ground) के नियमों में अंतर पता नहीं होता।
- श्मशान से लौटने पर – वहां से आने पर तुरंत कपड़े बदलकर नहाना अनिवार्य (Mandatory) होता है, क्योंकि वहां मृत शरीर के बैक्टीरिया और भारी नकारात्मक ऊर्जा होती है।
- मंदिर से लौटने पर – यहाँ नहाना जरूरी नहीं है, बस हाथ-पैर धोना (हाइजीन के लिए) काफी है।
क्या करें, क्या न करें?
तो, निष्कर्ष यह है कि मंदिर से लौटकर हाथ-पैर धोने में कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह सेहत के लिए अच्छा है।
- पैरों को जरूर धोएं – क्योंकि आप नंगे पैर चले हैं और गंदगी लेकर घर में घूमना सही नहीं है।
- हाथ धोएं – क्योंकि आपने सीढ़ियों, रेलिंग या दरवाजों को छूआ होगा।
- चेहरा न धोएं (अगर तिलक लगा है) – ताकि उस सकारात्मक ऊर्जा को आप थोड़ी देर महसूस कर सकें।
अगली बार जब आप मंदिर से आएं और बेसिन (Basin) की तरफ बढ़ें, तो मन में यह वहम न रखें कि भगवान का आशीर्वाद धुल जाएगा। भगवान का आशीर्वाद आपके कर्मों और मन में होता है, पैरों की धूल में नहीं! स्वच्छता में ही ईश्वर का वास है, इसलिए साफ-सुथरा रहना भी एक तरह की पूजा ही है।
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