क्या आप जीवन में समस्त ऐश्वर्य, सौंदर्य और आत्मिक शांति की तलाश में हैं? सनातन धर्म की गुप्त साधनाओं में ‘दश महाविद्याओं’ का स्थान सर्वोच्च है। इनमें से तीसरी महाविद्या हैं – माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी। माघ मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली ललिता जयंती (Lalita Jayanti) केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की उस शक्ति की आराधना का पर्व है जो ‘श्री’ यानी अनंत समृद्धि की दात्री हैं। इस लेख में हम गहराई से जानेंगे कि ललिता जयंती क्यों मनाई जाती है, इसकी पौराणिक कथा क्या है, और वे कौन से विशेष नियम हैं जिनका पालन करके आप देवी की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
कौन हैं माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी? (Who is Goddess Lalita)
माँ ललिता को राजराजेश्वरी और त्रिपुर सुंदरी के नाम से भी जाना जाता है। ‘त्रिपुर’ का अर्थ है तीन लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) या तीन गुणों (सत, रज, तम) से परे। देवी का रूप 16 वर्ष की किशोरी जैसा है, इसलिए उन्हें ‘षोडशी‘ भी कहा जाता है।
शास्त्रों के अनुसार, माँ ललिता का सौंदर्य इतना दिव्य है कि स्वयं कामदेव भी उनके सामने नतमस्तक हो जाते हैं। वे भगवान शिव के नाभि से निकले कमल पर विराजमान हैं और उनके चार हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण सुशोभित हैं।
विशेष नोट – श्री यंत्र (Shree Yantra) की साधना वास्तव में माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी की ही साधना है।
ललिता जयंती का महत्व
ललिता जयंती का व्रत और पूजन भक्तों को मोक्ष और भोग दोनों प्रदान करता है। इसका आध्यात्मिक और भौतिक महत्व असीमित है:
- माँ ललिता सौंदर्य की अधिष्ठात्री हैं। इनकी पूजा से व्यक्तित्व में तेज और आकर्षण उत्पन्न होता है।
- जिन जातकों के वैवाहिक जीवन में कलह हो या विवाह में विलंब हो रहा हो, उनके लिए यह व्रत वरदान समान है।
- माँ ललिता को महालक्ष्मी का ही उग्र और अत्यंत शक्तिशाली रूप माना जाता है, जो दरिद्रता का नाश करती हैं।
- चूंकि वे एक महाविद्या हैं, इसलिए उनकी साधना से गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं का शमन होता है।
ललिता जयंती की पौराणिक व्रत कथा (Lalita Jayanti Vrat Katha)
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार नैमिषारण्य में ऋषियों ने सूत जी से देवी के प्राकट्य की कथा पूछी। सूत जी ने बताया:
भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म किए जाने के बाद, चित्रकर्म नामक एक गण ने कामदेव की भस्म से एक पुतला बनाया। भगवान शिव की दृष्टि पड़ते ही उस पुतले में प्राण आ गए। उसका नाम ‘भंडासुर’ रखा गया। शिव के क्रोध से उत्पन्न होने के कारण वह आसुरी प्रवृत्तियों से भरा था। उसने घोर तपस्या कर विशेष वरदान प्राप्त किए और तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया।
भंडासुर के अत्याचार से परेशान होकर देवताओं ने महायज्ञ किया। उस महायज्ञ की अग्नि (चिदग्नि कुण्ड) से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। यह तेज करोड़ों सूर्य के समान था। इसी तेज पुंज से माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी का प्राकट्य हुआ।
माँ ललिता ने भंडासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया। बाद में, माँ ने कामदेव को भी पुनर्जीवित किया, जिससे सृष्टि में प्रेम और सृजन का चक्र पुनः संतुलित हुआ। इसलिए, ललिता जयंती को बुराई पर दैवीय शक्ति की विजय और प्रेम की पुनर्स्थापना के रूप में मनाया जाता है।
ललिता जयंती पूजन विधि
ललिता जयंती की पूजा अत्यंत पवित्रता और सूक्ष्म नियमों की मांग करती है। यहाँ सरल विधि दी गई है:
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और श्वेत या गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें और ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में एक चौकी स्थापित करें।
- चौकी पर लाल या गुलाबी वस्त्र बिछाएं। माँ ललिता की तस्वीर या श्री यंत्र स्थापित करें। कलश में जल भरकर, आम के पत्ते और नारियल रखकर स्थापित करें।
- माँ ललिता को गुड़हल (Hibiscus) या कमल का फूल अत्यंत प्रिय है। भोग के लिए खीर या दूध से बनी मिठाई का प्रयोग करें।
- सबसे पहले गणेश जी का ध्यान करें। फिर माँ ललिता को कुमकुम, अक्षत, इत्र और पुष्प अर्पित करें। श्री यंत्र पर कुमकुम चढ़ाना (कुमकुम अर्चन) इस दिन सबसे फलदायी माना जाता है।
- स्फटिक या रुद्राक्ष की माला से निम्न मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें: “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः” अथवा ललिता सहस्रनाम (Lalita Sahasranama) का पाठ करें।
पूजन के विशेष नियम और सावधानियां (Rules & Precautions)
दश महाविद्या की साधना में नियमों का पालन बहुत महत्वपूर्ण है:
- इस दिन पूर्ण सात्विक रहें। प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का त्याग करें।
- पूजा करते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
- यह पूजा केवल कर्मकांड नहीं है; माँ के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव होना अनिवार्य है। क्रोध और निंदा से बचें।
- माँ ललिता स्त्री स्वरूप हैं। इस दिन घर की महिलाओं और कन्याओं का विशेष सम्मान करें और उन्हें उपहार दें।
ललिता जयंती पर करें ये महा-उपाय (Powerful Remedy)
यदि आपके जीवन में आर्थिक संकट है या धन टिकता नहीं है, तो ललिता जयंती की शाम को श्री सूक्त (Sri Sukta) का पाठ करें और गाय के घी का दीपक जलाकर माँ को मखाने की खीर का भोग लगाएं। इसके बाद 9 कन्याओं को यह खीर प्रसाद स्वरूप खिलाएं। यह उपाय धन के बंद दरवाजे खोलने में सहायक माना जाता है।
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