हिंदू धर्म के पावन कैलेंडर में माघ मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन न केवल माघ स्नान संपन्न होता है, बल्कि ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली और सुंदर देवी मां ललिता (त्रिपुर सुंदरी) का प्राकट्य उत्सव भी मनाया जाता है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब पहले से ही जगत जननी मां पार्वती और लक्ष्मी मौजूद थीं, तो मां ललिता के प्राकट्य की आवश्यकता क्यों पड़ी? उनके प्राकट्य के पीछे की कथा जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही रोमांचक भी। आइए, समय के पहिये को पीछे घुमाते हैं और चलते हैं उस काल में जब सृष्टि पर एक भयंकर संकट मंडरा रहा था।
मां ललिता त्रिपुर सुंदरी के प्राकट्य की रहस्यमयी कथा
मां ललिता के प्राकट्य की कहानी भगवान शिव और कामदेव के एक प्रसंग से शुरू होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया था, तब कामदेव की राख से ‘चित्रकर्मा’ नामक एक गण ने एक पुतले का निर्माण किया।
भगवान शिव की दृष्टि जैसे ही उस पुतले पर पड़ी, वह जीवित हो उठा। वह बालक अत्यंत तेजस्वी था, लेकिन राख (तप के विध्वंस) से पैदा होने के कारण उसमें आसुरी प्रवृत्तियां आ गईं। आगे चलकर यही बालक ‘भंडसुर’ के नाम से जाना गया।
भंडसुर ने शिव जी की घोर तपस्या की और उनसे एक अजीब वरदान प्राप्त किया – “कि उसे कोई भी ऐसा जीव न मार सके जो किसी माता-गर्भ से जन्मा हो।” साथ ही उसे यह वरदान भी मिला कि उसके सामने लड़ने वाले शत्रु की आधी शक्ति उसे प्राप्त हो जाएगी।
शक्ति के मद में चूर होकर भंडसुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। भंडसुर का आतंक इतना बढ़ गया कि उसने प्रकृति के चक्र को ही बाधित कर दिया। देवता समझ चुके थे कि भंडसुर का वध कोई साधारण देवता या शक्ति नहीं कर सकती, क्योंकि वह सीधे तौर पर किसी गर्भ से उत्पन्न नहीं हुआ था।
तब देवर्षि नारद के परामर्श पर सभी देवताओं ने ‘महायज्ञ’ करने का निर्णय लिया। यह कोई साधारण यज्ञ नहीं था, यह मां आदि-शक्ति को प्रसन्न करने के लिए किया गया ‘चिदग्नि’ यज्ञ था।
जब देवताओं ने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित करने की ठानी, तब यज्ञ कुंड के बीचों-बीच से एक प्रचंड और दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। वह प्रकाश इतना शीतल था जैसे करोड़ों चंद्रमा एक साथ उदय हो गए हों।
उसी दिव्य ज्योति के मध्य से मां ललिता त्रिपुर सुंदरी प्रकट हुईं। वे एक रथ पर विराजमान थीं, जिसे ‘चक्र राज’ कहा जाता है।
- उनके हाथ में धनुष, बाण, पाश (फंदा) और अंकुश था।
- उनका सौंदर्य ऐसा था कि जिसे देख स्वयं कामदेव भी लज्जित हो जाएं।
- वे न तो किसी के गर्भ से जन्मी थीं और न ही किसी के द्वारा निर्मित थीं; वे साक्षात परब्रह्म की इच्छा शक्ति का स्वरूप थीं।
भंडसुर का वध और ललिता जयंती का महत्व
मां ललिता ने अपनी शक्तियों से भंडसुर की मायावी सेना का विनाश किया। अंत में, उन्होंने ‘महाकामेश्वर अस्त्र’ का प्रयोग कर भंडसुर और उसके द्वारा निर्मित ‘शून्यक नगर’ को भस्म कर दिया। जिस दिन मां ने देवताओं को इस संकट से मुक्ति दिलाई और सृष्टि में पुनः संतुलन स्थापित किया, उसी दिन को ‘ललिता जयंती’ के रूप में मनाया जाने लगा।
क्यों मनाई जाती है यह जयंती?
- शून्य का अंत – भंडसुर ‘अज्ञान’ और ‘शून्य’ का प्रतीक था। मां ललिता का प्राकट्य ज्ञान और आनंद का प्रतीक है।
- स्त्री शक्ति का सर्वोच्च रूप – यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब पुरुष शक्तियां (देवता) विफल हो जाती हैं, तब ब्रह्मांड की परम सत्ता ‘स्त्री’ स्वरूप धारण कर संतुलन बनाती है।
- श्री विद्या का प्रसार – इसी दिन से ‘श्री विद्या’ की साधना का मार्ग प्रशस्त हुआ, जो साधक को भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती है।
मां ललिता के स्वरूप का रहस्य
मां ललिता को ‘राजराजेश्वरी’ भी कहा जाता है। उनके स्वरूप में तीन रहस्य छिपे हैं:
- त्रिपुर सुंदरी – वे तीन पुरों (जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) से परे हैं।
- शोडशी – वे हमेशा 16 वर्ष की आयु के समान युवा और ऊर्जावान रहती हैं।
- पंचतत्वातीता – वे पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को नियंत्रित करने वाली स्वामिनी हैं।
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