शबरी जयन्ती की आपको हार्दिक शुभकामनाएं! माता शबरी भक्ति और प्रतीक्षा की पराकाष्ठा का प्रतीक हैं। उनकी कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर भाव के भूखे होते हैं, जाति या कुल के नहीं। यहाँ शबरी जयन्ती की सम्पूर्ण व्रत कथा दी गई है:
|| माता शबरी व्रत कथा (Mata Shabari Vrat Katha PDF) ||
पौराणिक कथा के अनुसार, माता शबरी का जन्म एक भील परिवार में हुआ था। उनका नाम ‘श्रमणा’ था। जब वे विवाह योग्य हुईं, तो उनके विवाह की तैयारियाँ शुरू हुईं। उस समय की परंपरा के अनुसार, विवाह के भोज के लिए सैकड़ों पशुओं की बलि दी जानी थी। जब श्रमणा को यह ज्ञात हुआ कि उनके कारण इतने निर्दोष जीवों की हत्या होगी, तो उनका हृदय करुणा से भर गया। वे रातों-रात घर छोड़कर वन की ओर निकल गईं।
वन में भटकते हुए वे मतंग ऋषि के आश्रम पहुँचीं। भील कन्या होने के कारण उन्हें समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन मतंग ऋषि ने उनकी अटूट भक्ति को पहचान लिया और उन्हें अपने आश्रम में स्थान दिया। शबरी वर्षों तक ऋषि की सेवा करती रहीं।
जब मतंग ऋषि का अंत समय निकट आया, तो शबरी व्याकुल हो गईं। उन्होंने पूछा कि उनके जाने के बाद वे किसके सहारे जिएंगी? तब ऋषि ने कहा – “पुत्री, धैर्य रखो। एक दिन भगवान राम स्वयं तुम्हारी कुटिया में आएंगे। तुम उनकी प्रतीक्षा करना।”
ऋषि के वचनों पर अटूट विश्वास कर शबरी हर दिन अपनी कुटिया साफ करतीं, रास्ते के कंकड़-पत्थर चुनतीं और फूलों से मार्ग सजातीं। वे रोज मीठे बेर चुनकर लातीं और उन्हें चखकर देखतीं कि कहीं कोई बेर खट्टा तो नहीं है। वे केवल मीठे और जूठे बेर एक टोकरी में जमा करतीं।
वर्षों बीत गए, शबरी वृद्ध हो गईं, उनकी आंखें कमजोर हो गईं, लेकिन राम के आने का विश्वास कम नहीं हुआ। अंततः वनवास के दौरान माता सीता की खोज करते हुए भगवान राम और लक्ष्मण शबरी की कुटिया में पहुँची।
भगवान को देखते ही शबरी के आनंद की सीमा न रही। उन्होंने प्रेम के वशीभूत होकर भगवान को वही ‘जूठे बेर’ खिलाने शुरू कर दिए। लक्ष्मण जी को जूठे बेर खिलाने में संकोच हुआ, लेकिन राम जी ने बड़े प्रेम से उन बेरों को ग्रहण किया और कहा – “मुझे कंद-मूल और छप्पन भोग में वो स्वाद नहीं मिला, जो शबरी के इन प्रेम भरे बेरों में है।”
भगवान राम ने शबरी की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें ‘नवधा भक्ति’ का उपदेश दिया और उन्हें मोक्ष प्रदान किया।
|| शबरी जयंती व्रत का महत्व ||
शबरी जयंती का व्रत करने से साधक के भीतर अटूट धैर्य, भक्ति और करुणा का संचार होता है। यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर को पाने के लिए केवल ‘शुद्ध भाव’ की आवश्यकता होती है।
|| शबरी जयंती पूजा विधि संक्षिप्त में ||
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान राम और माता शबरी के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्वलित करें।
- उन्हें ताजे फल (विशेषकर बेर) और फूल अर्पित करें।
- रामायण के ‘शबरी प्रसंग’ का पाठ करें।
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