मंगलवार व्रत की आरती (Mangalwar Aarti) मुख्य रूप से भगवान हनुमान को समर्पित है। मंगलवार का दिन हनुमान जी का माना जाता है, और भक्त व्रत रखकर उनकी पूजा करते हैं। व्रत की समाप्ति पर यह आरती गाई जाती है। सबसे प्रसिद्ध आरती है “आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की”। यह आरती हनुमान जी के बल, वीरता और राम-काज संवारने वाले गुणों का बखान करती है। इसे गाने से भक्त अपने सभी कष्टों, रोगों और बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।
मंगलवार का दिन दिन भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन के कष्टों को दूर करने के लिए मंगलवार का व्रत रखते हैं। हनुमान जी की पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उनकी आरती है, जिसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। मुख्य रूप से “आरती कीजै हनुमान लला की” का गायन करने से घर में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस आरती के नियमित पाठ से शत्रुओं का नाश होता है और भक्तों को साहस एवं बल प्राप्त होता है। यदि आप शुद्ध और स्पष्ट शब्दों में लिखी हुई आरती चाहते हैं, तो Mangalwar Aarti PDF हमारी वेबसाइट से डाउनलोड करें। इसे अपने पास सुरक्षित रखकर आप कहीं भी भक्ति भाव से पाठ कर सकते हैं।
मंगलवार व्रत की आरती PDF एक डिजिटल दस्तावेज़ है जिसमें हनुमान जी को समर्पित प्रसिद्ध आरती के पवित्र बोल शामिल होते हैं। मंगलवार का दिन हनुमान जी की उपासना और व्रत के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी पूजा का समापन इसी आरती के गायन से करते हैं। PDF प्रारूप में उपलब्ध यह आरती भक्तों को किसी भी स्थान पर सरलता से पढ़ने और गाने की सुविधा प्रदान करती है।
|| मंगलवार व्रत की आरती (Mangalwar Aarti PDF) ||
आरती कीजै हनुमान लला की ।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ।।
जाके बल से गिरिवर कांपै ।
रोग-दोष जाके निकट न झांपै ।।
अंजनि पुत्र महा बलदाई ।
संतन के प्रभु सदा सहाई ।।
दे बीरा रघुनाथ पठाए ।
लंका जारि सिया सुधि लाये ।।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई ।
जात पवनसुत बार न लाई ।।
लंका जारि असुर सब मारे ।
सियाराम जी के काज संवारे ।।
लक्ष्मण मूर्च्छित पड़े सकारे ।
लाय संजीवन प्राण उबारे ।।
पैठि पताल तोरि जमकारे ।
अहिरावण की भुजा उखारे ।।
बाईं भुजा असुर संहारे ।
दाईं भुजा संत जन तारे ।।
सुर नर मुनि आरती उतारें ।
जय जय जय हनुमान उचारें ।।
कंचन थार कपूर लौ छाई ।
आरति करत अंजना माई ।।
जो हनुमान जी की आरती गावे ।
बसि बैकुण्ठ परमपद पावे ।।
लंक विध्वंस किए रघुराई ।
तुलसिदास प्रभु कीरति गाई ।।
|| इति श्री हनुमान जी की आरती ||
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