मेष संक्रान्ति, जिसे भारत के कई हिस्सों में सत्तू संक्रान्ति या जुड़ शीतल के रूप में भी मनाया जाता है, सौर नववर्ष का आरंभ माना जाता है। इस दिन सूर्य मीन राशि को त्यागकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं। यहाँ मेष संक्रान्ति की पौराणिक कथा और महत्व का विवरण दिया गया है:
|| मेष संक्रान्ति की पौराणिक कथा ||
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मेष संक्रान्ति का सीधा संबंध राजा भगीरथ और गंगा अवतरण से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का निर्णय लिया। गंगा का वेग इतना तीव्र था कि उसे केवल भगवान शिव ही संभाल सकते थे।
मेष संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी शिव की जटाओं से निकलकर पृथ्वी पर प्रवाहित हुई थीं। इसी कारण इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस दिन स्नान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
सत्तू दान की कथा
शास्त्रों के अनुसार, वैशाख मास (जो मेष संक्रान्ति से शुरू होता है) में सूर्य की तपिश बढ़ने लगती है। एक कथा के अनुसार, इस दिन यमराज ने ब्राह्मण का रूप धरकर राजा से जल और शीतल अन्न का दान मांगा था। तब राजा ने ब्राह्मण को सत्तू, घड़ा और पंखा दान किया।
तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि इस दिन सत्तू (जौ और चने का आटा) खाया जाता है और दान किया जाता है। इसे “सतुआन” भी कहते हैं।
|| मेष संक्रान्ति के मुख्य रीति-रिवाज ||
- पवित्र स्नान – भक्त सुबह जल्दी उठकर गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करते हैं।
- सत्तू और गुड़ का भोग – इस दिन भगवान को सत्तू, गुड़ और आम का टिकोरा (कच्ची अमिया) अर्पित किया जाता है।
- दान-पुण्य – गर्मी से राहत दिलाने वाली वस्तुओं जैसे मिट्टी के घड़े (सुराही), हाथ का पंखा, खरबूजा और सत्तू का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- पितृ तर्पण – कई क्षेत्रों में लोग अपने पितरों के नाम पर जल और अन्न का दान करते हैं।
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