श्री राम हृदयम् अध्यात्म रामायण के युद्ध कांड का एक अत्यंत पवित्र और सारगर्भित अंश है। यह भगवान श्री राम के वास्तविक स्वरूप और उनकी दिव्य शक्ति का निरूपण करता है। इसमें श्री राम को केवल एक राजा या मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि परम ब्रह्म, अजन्मा और अविनाशी तत्व के रूप में वर्णित किया गया है।
इस स्तोत्र का मुख्य संदेश यह है कि राम ही समस्त जगत के आधार हैं और उनकी माया ही सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करती है। हनुमान जी को दिए गए इस उपदेश में भक्ति और ज्ञान का सुंदर समन्वय मिलता है। इसका पाठ करने से साधक के हृदय में शांति, भक्ति और आत्मज्ञान का उदय होता है। संक्षेप में, ‘राम हृदयम्’ अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला एक आध्यात्मिक रत्न है।
|| श्री राम हृदयम् ||
ततो रामः स्वयं प्राह हनुमन्तमुपस्थितम् ।
शृणु यत्वं प्रवक्ष्यामि ह्यात्मानात्मपरात्मनाम् ॥
आकाशस्य यथा भेदस्त्रिविधो दृश्यते महान् ।
जलाशये महाकाशस्तदवच्छिन्न एव हि ।
प्रतिबिम्बाख्यमपरं दृश्यते त्रिविधं नभः ॥
बुद्ध्यवच्छिन्नचैतन्यमेकं पूर्णमथापरम् ।
आभासस्त्वपरं बिम्बभूतमेवं त्रिधा चितिः ॥
साभासबुद्धेः कर्तृत्वमविच्छिन्नेऽविकारिणि ।
साक्षिण्यारोप्यते भ्रान्त्या जीवत्वं च तथाऽबुधैः ॥
आभासस्तु मृषाबुद्धिरविद्याकार्यमुच्यते ।
अविच्छिन्नं तु तद्ब्रह्म विच्छेदस्तु विकल्पितः ॥
अविच्छिन्नस्य पूर्णेन एकत्वं प्रतिपद्यते ।
तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्च साभासस्याहमस्तथा ॥
ऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः ।
तदाऽविद्या स्वकार्यैश्च नश्यत्येव न संशयः ॥
एतद्विज्ञाय मद्भक्तो मद्भावायोपपद्यते
मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम् ।
न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात्तेषां जन्मशतैरपि ॥
इदं रहस्यं हृदयं ममात्मनो
मयैव साक्षात्कथितं तवानघ ।
मद्भक्तिहीनाय शठाय न त्वया
दातव्यमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकम् ॥
॥ श्रीमदध्यात्मरामायणे बालकाण्डे श्रीरामहृदयं सम्पूर्णम् ॥
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