भारत की आध्यात्मिक राजधानी वाराणसी (काशी) में स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के अक्षय धैर्य और पुनरुत्थान का जीवंत प्रमाण है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जिसे ‘विश्वेश्वर’ यानी ‘समस्त ब्रह्मांड का शासक’ कहा जाता है। इसका इतिहास हजारों वर्ष पुराना है, लेकिन पिछले 350 वर्षों की इसकी यात्रा, विध्वंस, संघर्ष और पुनर्निर्माण की एक ऐसी गाथा है जो आज के भव्य कॉरिडोर के रूप में चरमोत्कर्ष पर पहुँची है।
विध्वंस का वो दौर – औरंगजेब का आक्रमण (1669 ई.)
काशी विश्वनाथ मंदिर ने विदेशी आक्रमणकारियों और शासकों के कई हमले झेले, लेकिन सबसे निर्णायक और हृदय विदारक क्षण मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में आया।
क्रूर फरमान
इतिहासकार साकी मुस्तैद खान द्वारा लिखित ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ के अनुसार, औरंगजेब ने 8 अप्रैल, 1669 को बनारस (काशी) के सभी मंदिरों और पाठशालाओं को ध्वस्त करने का शाही फरमान जारी किया। वह हिंदुओं की धार्मिक प्रथाओं और त्योहारों पर भी रोक लगाना चाहता था।
मंदिर का विध्वंस
फरमान के बाद, औरंगजेब की सेना ने काशी विश्वनाथ मंदिर पर आक्रमण कर दिया। कई महीनों के संघर्ष के बाद, सितंबर 1669 तक मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया।
- ज्ञानवापी का कुआँ – पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंदिर के महंत ने स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को मुगल आक्रांताओं से बचाने के लिए उसे ज्ञानवापी कुएँ में कूदकर छिपा दिया था।
- ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण – मंदिर के मूल स्थान को खंडित करके, औरंगजेब ने वहां एक मस्जिद का निर्माण करा दिया, जिसे आज ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जाना जाता है। यह कालखंड काशी के इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय था, जिसने आस्था के एक प्रमुख केंद्र को गहरे आघात दिए।
आस्था का पुनर्जन्म – अहिल्या बाई होल्कर का योगदान (1780 ई.)
औरंगजेब के आक्रमण के बाद लगभग एक शताब्दी तक, मूल ज्योतिर्लिंग का स्थान ज्ञानवापी परिसर के भीतर ही दबे स्वरूप में रहा। लेकिन सनातन धर्म में पुनर्निर्माण की भावना कभी नहीं मरती।
- पुनर्निर्माण का संकल्प – 18वीं शताब्दी के अंत में, इंदौर की पुण्यश्लोक महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने काशी विश्वनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया।
- वर्तमान संरचना – उन्होंने 1780 ई. में ज्ञानवापी परिसर से सटे हुए एक निकटवर्ती स्थान पर वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। काशी नरेश महाराजा चेत सिंह के सहयोग से यह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह वही मंदिर है, जिसके दर्शन लाखों श्रद्धालु सदियों से करते आ रहे थे।
- स्वर्ण शिखर – बाद में, 1839 ई. में पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के गुंबद को लगभग 15.5 मीटर ऊँचा सोने का छत्र दान किया, जिसने मंदिर की भव्यता में चार चाँद लगा दिए।
रानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा निर्मित यह मंदिर, उस समय से लेकर आधुनिक कॉरिडोर के निर्माण तक, हिंदू आस्था का केंद्र बना रहा।
आधुनिक भव्यता – श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर
दो सदियों तक, अहिल्या बाई द्वारा निर्मित मंदिर काशी की संकरी गलियों में सीमित रहा, जहाँ दर्शनार्थियों को काफी असुविधा होती थी। लेकिन 21वीं सदी में एक ऐतिहासिक परिवर्तन आया।
संकल्प और उद्घाटन
- मार्च 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर’ परियोजना की आधारशिला रखी।
- 13 दिसंबर, 2021 को प्रधानमंत्री द्वारा इस भव्य कॉरिडोर के पहले चरण का उद्घाटन किया गया।
नया स्वरूप और विशेषताएं
कॉरिडोर ने लगभग 350 साल बाद मंदिर के स्वरूप को पूरी तरह से बदल दिया।
- पहले यह परिसर सिर्फ 3,500 वर्ग फुट तक सीमित था, जिसे अब बढ़ाकर लगभग 5 लाख वर्ग फुट से अधिक के विशाल क्षेत्र में बदल दिया गया है।
- इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसने विश्वनाथ मंदिर को सीधे गंगा नदी के घाटों (मणिकर्णिका और ललिता घाट) से जोड़ दिया है। अब श्रद्धालु सीधे गंगा में स्नान कर, जल लेकर मंदिर तक आसानी से पहुंच सकते हैं।
- इस धाम में 23 से अधिक नई इमारतें बनाई गई हैं, जिनमें यात्री सुविधा केंद्र, वैदिक केंद्र, मुमुक्षु भवन, सिटी म्यूजियम, भोगशाला और फूड कोर्ट शामिल हैं।
- कॉरिडोर के निर्माण में मकराना, चुनार के लाल बलुआ पत्थर और सात विशेष पत्थरों का उपयोग किया गया है, जो इसकी भव्यता को बढ़ाते हैं।
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